Ajit Doval: a stooge, or an enemy within?

Ajit Doval: a stooge, or an enemy within? Tue, 20 Nov 2018

अजीत डोवाल : कठपुतली या अंदरुनी दुश्मन?

अभूतपूर्व तरीके से घट रही दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के क्रम में सीबीआई के डीआईजी मनीष कुमार सिन्हा ने एक याचिका दाखिल कर आरोप लगाया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोवाल ने विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच में हस्तक्षेप किया और उनके घर की जांच करने से रोका। शब्दों के साथ खेलते हुए, जिसमें मोदी जी माहिर हैं, श्री सिन्हा ने सीबीआई को बोगस जांच केंद्र बताया है - ये दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन अधिकारी की हिम्मत और बुद्धि की दाद दी जानी चाहिए। हालांकि, याचिका में कई सारे आरोपों में से ये एक आरोप था, अन्य आरोपों की सूची लंबी है।

Read this story in English

याचिका में श्री मनीष कुमार सिन्हा ने अपने नागपुर तबादले को मनमाना और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए इसे मोदी जी के करीबी - श्री राकेश अस्थाना को जांच से बचाने की कोशिश और उनके खिलाफ की गयी जांच का परिणाम बताया, जिसे रद्द किया जाना चाहिए। याचिका में पीएमओ, कोयला और खान राज्य मंत्री हरिभाई पार्थीभाई चौधरी, कानून सचिव सुरेश चन्द्रा और कैबिनेट सचिव प्रदीप कुमार सिन्हा पर भी गंभीर आरोप लगाए गये हैं। बेहद आसान और सीधा सवाल ये है कि आखिर ये सब क्या छुपाने की कोशिश कर रहे हैं, और यदि इस महान् मोदी सरकार के पास छुपाने को कुछ नहीं है तो फिर इतनी खींचातानी क्यों?


अजीत डोवाल कनेक्शन

श्री मनीष सिन्हा ने अपनी याचिका में खुलासा किया कि श्री राकेश अस्थाना द्वारा आरोपी मोइन कुरैशी से रिश्वत लेने के मामले में उनके खिलाफ प्राथमिकी 15 अक्टूबर, 2018 को की गयी और 17 अक्टूबर, 2018 को तत्कालीन सीबीआई निदेशक, श्री आलोक वर्मा ने एफआईआर के बारे में एनएसए को सूचित किया। खबरों से पता चला कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोवाल ने सबसे पहले एफआईआर की जानकारी राकेश अस्थाना को दी। जिसके बाद उसने एनएसए से यह सुनिश्चित करने का अनुरोध किया कि उसे गिरफ्तार नहीं किया जाए। इसके बाद, जब जांच अधिकारी, ए के बस्सी ने जांच आगे बढ़ाई और सबूतों को जब्त करने की अनुमति मांगी, जिनमें मोबाइल फोन भी शामिल था - तो तत्कालीन सीबीआई निदेशक द्वारा इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया गया, क्योंकि एनएसए ने इसकी अनुमति नहीं दी थी। 22 अक्टूबर, 2018 को एक और अनुरोध रिकार्ड में दर्ज किया गया जिसे पुनः खारिज कर दिया गया, क्योंकि एनएसए ने इसकी अनुमति नहीं दी। यहां चिंता की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात ये है कि सीबीआई जो कार्मिक विभाग और सीवीसी विभाग के अधीन काम करती है, को एनएसए से अनुमति लेने की जरुरत क्यों पड़ रही है? क्या एनएसए किसी के इशारे पर काम कर रहे हैं? यदि ऐसा है तो वो कौन है? ये साफ तौर पर सीबीआई की स्वायत्तता को नष्ट करने का लक्षण है। हमें बेहद दुःख के साथ ये कहना पड़ रहा है कि सीबीआई पिंजरे में बंद तोता नहीं बल्कि किसी और की बदनीयत पर नाचने वाली कठपुतली बन चुकी है, जो राजनीतिक फायदे और प्रतिशोध लेने के लिये अपनों को बचाने तथा दूसरों को फंसाने के काम में लगी हुई है।


एनएसए अजीत डोवाल का ठीक-ठाक सेवा रिकार्ड रहा है। वे स्व-घोषित जासूस रहे हैं जो मौजूदा सरकार में कूटनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मसलों पर काम कर रहे हैं। उनको भारत का सबसे प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है क्योंकि वो ‘भारत के सबसे ताकतवर व्यक्ति’ के आंख-कान माने जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जासूस अक्सर विफलताओं से जाने जाते हैं, क्योंकि सफल मिशन का खुलासा वो नहीं करते, असफल को वो छुपा नहीं सकते। लेकिन अजीत डोवाल ने तो खुद अपने जासूसी मिशनों के बारे में बताते हुए अपनी पीठ ठोंकी। गोदी मीडिया ने भी उनको देसी जेम्स बॉन्ड का अवतार बताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। हालांकि, मीडिया या डोवाल द्वारा बताई गयी किसी भी घटना को कभी सत्यापित नहीं किया गया। लेकिन, श्री डोवाल के करियर की कुछ घटनाएं ऐसी हैं जिन्हें सत्यापित किया जा सकता है, जो इस प्रकार हैं -


दिसंबर, 1999 में भारत ने बेहद शर्मनाक घटना के दौरान अपहरणकर्ताओं के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। कमजोर वाजपेयी सरकार ने इन्हीं डोवाल की मदद से अपने घुटने टेके और खुद रक्षा मंत्री हवाई जहाज में तीन खूंखार आतंकवादियों को बैठाकर कांधार तक छोड़ने गये। आरोप है कि रक्षा मंत्री आतंकवादियों की अगुवाई कर रहे थे, जबकि डोवाल नकदी से भरे बैग ले कर जा रहे थे - ये तो उनका राजनयिक और वार्ता कौशल हैं। हालांकि, इसकी सच्चाई शायद ही पता चल पायेगी।


मौजूदा कश्मीर संकट : 2013 में 31 स्थानीय युवा आतंकवाद में शामिल हुए, यह संख्या 2017 में 126 पर पहुंच गई। जो कि पिछले सात वर्षों में सबसे अधिक थी। 1989 के बाद से पहली बार स्थानीय लोग एक बार फिर से ज्यादा संख्या में आतंकवाद की धारा की ओर रुख कर रहे हैं। 2006 में जहां आतंकी घटनाओं की संख्या 1438 थी वो 2012 में घटकर सिर्फ 124 रह गई थी। आतंकवादियों के मारे जाने में भी इसी तरह का रुझान दिखा था जो कि 2006 में 591 था तो 2017 में 213 हो गया। सुरक्षा बलों के हताहतों की संख्या 182 से मात्र 15 रह गई (आतंकवाद के 28 वर्षों के दौरान सबसे कम)। 2017 में यह आंकड़ा दोबारा बढ़कर 80 पर पहुंच गया। डोवाल जी के सुझावों और श्री मोदी की खराब नीतियों के चलते ही यूपीए के 10 वर्षों के रचनात्मक काम को केवल चार वर्षों में बर्बाद कर दिया गया।


भारत की ‘पड़ोसी पहले’ की नीति : ऐसा कहा जाता है कि 2015 में नेपाल की आर्थिक नाकेबंदी का विचार डोवाल का ही था। इस नाकाबंदी से भारत-नेपाल के संबंधों पर गंभीर असर पड़ा और नेपाल की राजनीति को भारत से दूर करके उसे विरोधियों के पाले में ढकेल दिया। यह मुद्दा और भी गंभीर होता जा रहा है क्योंकि ये खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। भारत के सारे पड़ोसी मोदी सरकार की कथित ‘पड़ोसी पहले’ की नीति से नाराज हो रहे हैं और यह नीति पूरी तरह से उल्टा प्रभाव डाल रही है। इसका सारा श्रेय डोवाल जी को ही जाता है।


हरिभाई पार्थीभाई चौधरी कनेक्शन

कोयला और खान राज्य मंत्री श्री हरिभाई पार्थीभाई चौधरी पर सीबीआई के डीआईजी ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाये हैं। श्री मनीष कुमार सिन्हा ने आरोप लगाया है कि अस्थाना मामले में शिकायतकर्ता सतीश साना ने उन्हें बताया था कि मंत्री ने अवैध वसूली की है। याचिका के अनुसार, 2011 से लंबित मोईन कुरैशी रिश्वत मामले की जांच कर रहे कुछ विशेष अधिकारियों द्वारा चलाये जा रहे ‘वसूली’ रैकेट द्वारा मोदी कैबिनेट में कोयला और खान राज्यमंत्री हरिभाई पार्थीभाई चौधरी को जून 2018 के पहले पखवाड़े में ‘कुछ करोड़ रुपये’ हिस्से के तौर पर दिये गये थे।


गुजरात के बनसकांठा निर्वाचन क्षेत्र से सांसद हरिभाई पार्थीभाई चौधरी गृह राज्य मंत्री सहित कुछ महत्वपूर्ण मंत्रालय के प्रभारी हैं। क्या वो भी मोदी जी के पसंदीदा करीबियों में से एक हैं? मोईन कुरेशी मामले में आरोपी मंत्री इससे पहले लोकसभा में अपने गलत भाषण के कारण काफी चर्चा में रहे जब उन्होंने कहा था कि उन राज्यों की जेलों में भीड़ ज्यादा है, जहां मुस्लिम आबादी अधिक है। इसके अलावा, मेहुल चोकसी और नीरव मोदी दोनों गुजरात के बनासकांठा से जुड़े हैं। क्या कुछ और भी है? ये जानने के लिये इंतजार करना होगा।


इस बात के स्पष्ट सबूत हैं कि सत्ता के शीर्ष गलियारों में जमकर मिलीभगत का खेल चल रहा है। अस्थाना रिश्वत मामले की जांच को दबाने के लिये आईपीएस अधिकारियों समेत सीबीआई अधिकारियों को बड़े पैमाने पर इधर से उधर हटाया-बढ़ाया जा रहा है। राफेल घोटाले की जांच को रोकने के लिए सीबीआई निदेशक को रातों-रात कुर्सी से हटा दिया गया। कानून सचिव सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली सीवीसी जांच को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह मामला संदेसरा मामले की तरह ही कई मामलों से जुड़ा हुआ है। सरकार इतनी बेताब क्यों है? क्या वो अपने मंत्री हरिभाई पार्थीभाई चौधरी को बचा रही है? ऐसा नहीं लगता। समुद्र की हिंसक लहरें बड़ी-बड़ी मछलियों के लिये परेशानी का सबब बन गयी हैं। एक मछली जो दूसरी मछलियों को चारा ही नहीं दे रही बल्कि इस चारे की हिस्सेदारी में सबसे ऊपर कुंडली मारकर बैठी है और वो सब कुछ पचा लेना चाहती है।

Volunteer with us
Follow us fb