CBIvsCBI: A Case in Point for the Crisis in Indian Democracy

CBIvsCBI: A Case in Point for the Crisis in Indian Democracy Mon, 14 Jan 2019

सीबीआई बनाम सीबीआई : भारतीय लोकतंत्र के संकट का मामला

23-24 अक्टूबर, 2018 की दरम्यानी रात को मोदी सरकार ने भारतीय लोकतंत्र पर अपने सबसे घातक हमलों में से एक को अंजाम दिया। उसने यह दावा किया कि दोनों अधिकारियों के बीच चल रही खींचतान से संस्थान की अखंडता को खतरा पैदा हो गया है और फिर सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा सहित विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के सारे अधिकार छीनते हुए उन्हें जबरन उनके पदों से हटा दिया।

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इस आपसी खींचतान की पृष्ठभूमि पर नज़र डालें तो अगस्त 2017 की शुरुआत में अस्थाना का नाम एक हाई-प्रोफाइल भ्रष्टाचार मामले में सामने आया था। अस्थाना पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते तत्कालीन निदेशक वर्मा के कड़े विरोध के बावजूद मोदी सरकार ने अक्टूबर 2017 में अस्थाना को सीबीआई में विशेष निदेशक नियुक्त कर दिया। इसने वर्मा और अस्थाना के बीच सीबीआई में अंदरुनी टकराव शुरू हो गया और वे एक दूसरे के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए पलटवार करने लगे, वर्मा जहां अस्थाना के खिलाफ मामलों की जांच करते थे और अस्थाना की वर्मा के खिलाफ केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) को शिकायत करते थे।


दरअसल पूरे मामले में तब नया मोड़ आ गया और ये खासा चर्चित हो गया जब अक्टूबर 2018 में प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा सीबीआई निदेशक से मिले और राफेल विमान सौदे व ऑफसेट अनुबंध में कथित भ्रष्टाचार की जांच कराने का अनुरोध किया, जिसमें अनिल अंबानी को अवैध तरीके से फायदा पहुंचाया गया था। भूषण, शौरी और सिन्हा की तिकड़ी ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत जांच की जरुरत बताते हुए तमाम दस्तावेजों के साथ विस्तृत शिकायत दर्ज करायी।


मीडिया में आने वाली खबरों में दावा किया गया कि सरकार सीबीआई में चल रही इन चीजों से नाखुश थी। हालात तब और बिगड़ गये, जब अस्थाना के खिलाफ घूसखोरी के मामले में आधिकारिक तौर पर सीबीआई ने केस दर्ज किया और अन्य अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि वर्मा ने रक्षा मंत्रालय से राफेल सौदे से संबंधित दस्तावेजों को प्रमाणित करने का अनुरोध किया।


अपने पैरों के नीचे की जमीन खिसकती देख पीएम मोदी ने एक तरह से तख्तापलट करते हुए असंवैधानिक रूप से वर्मा सहित अस्थाना को आधी रात को उनके पद से हटा दिया और दावा किया कि उनके झगड़े के कारण संस्थान साख को गंभीर खतरा पैदा हो गया था, जबकि असल में डर पीएम मोदी को था कि अगर वर्मा तक राफेल सौदे के दस्तावेजों की पहुंच हो गयी तो उससे मोदी जी को खतरा पैदा हो जाता।  


प्रधानमंत्री की इस असंवैधानिक कार्रवाई का असर ये हुआ कि सीबीआई का शीर्ष स्तर लगभग बर्बाद हो गया, क्योंकि प्रमुख मामलों की जांच करने वाले दल भंग कर दिये गये, महत्वपूर्ण अधिकारियों को अंडमान और दूर-दराज के इलाकों में स्थानांतरित कर दिया गया तथा सीबीआई भवन सील कर दिया गया।


वर्मा खुद को गलत तरह से हटाये जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गये और सुप्रीम कोर्ट ने उनके तख्तापलट को असंवैधानिक मानते हुए दोबारा निदेशक के पद पर उनको बहाल कर दिया, ये प्रधानमंत्री के लिये तगड़ा झटका था, सुप्रीम कोर्ट ने वर्मा का भाग्य उच्चाधिकार प्राप्त समिति के हाथ में सौंप दिया, जिसमें कानून के अनुसार प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश के प्रतिनिधि शामिल थे।


सीबीआई निदेशक के तौर पर वर्मा की बहाली के संभावित परिणामों से बुरी तरह डरे पीएम ने बिना एक पल की देरी किये तुरंत नियुक्ति समिति की बैठक बुलाई और वर्मा को उनके पद से दोबारा हटा दिया। वर्मा के खिलाफ बिना किसी पुख्ता सबूत के भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाली सीवीसी की आधी-अधूरी रिपोर्ट कमेटी के सामने रखी गयीं, विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने वर्मा को हटाने का विरोध करते हुए अपनी लिखित असहमति दर्ज करायी।


इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस ए.के. पटनायक, जिन्हें सीवीसी जांच की निगरानी का जिम्मा सौंपा गया था, ने कहा कि वर्मा के खिलाफ ‘भ्रष्टाचार का कोई सबूत नहीं’ था और सीवीसी ने जो कहा उसे अंतिम नहीं माना जा सकता।’’ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद पर बहाल करने के महज दो दिन बाद ही हटाने वाली नियुक्ति समिति की आलोचना करते हुए कहा कि पीएम की अगुवाई वाली समिति ने बेहद, बेहद जल्दबाजी में फैसला किया।’’


वर्मा को उचित सुनवाई के बिना बर्खास्त करने का फैसला करने की आखिर क्या जल्दी थी? वर्मा को सिर्फ 3 सप्ताह के लिए अपने संवैधानिक कर्तव्यों को जारी रखने की अनुमति क्यों नहीं दी जा सकती थी? प्रधानमंत्री को किस बात का डर सता रहा था? क्या इस तरह से संस्थान की अखंडता की रक्षा हो रही है, क्योंकि उनका ही ऐसा दावा है या फिर ये राफेल सौदा है जिसे वो नहीं चाहते कि उसकी बारीकी से जांच-पड़ताल हो?


ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब मौजूदा सरकार को देना चाहिए, जिसने किसी न किसी तरह से अपने राजनीतिक फायदे के लिए स्वतंत्र संस्थानों पर हमला करना अपनी आदत बना ली है। भारतीय रिजर्व बैंक से लेकर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से लेकर न्यायपालिका तक, पीएम मोदी ने यह साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि वो किसी भी संस्था द्वारा उनके खिलाफ किसी भी तरह की असहमति को बर्दाश्त नहीं करेंगे। क्या ये लोकतंत्र की पहचान है या तानाशाही की है?


कोई इस बात को समझने में गलती न करें कि इस तरह की घटनाएं भारतीय लोकतंत्र की नींव पर एक बड़े हमले का हिस्सा हैं, जो मोदी सरकार की हरकतों के कारण अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है। हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं और परंपराओं पर आज मौजूदा सरकार की तरफ से ही खतरा पैदा हो गया है और हमें इससे लड़ने के लिए हर संभव कोशिश करने की जरूरत है।

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