Jaitley's Unique Identity - Lying Blog Mantri

Jaitley's Unique Identity - Lying Blog Mantri Mon, 07 Jan 2019

जेटल जी की अद्वितीय पहचान - झूठ बोलने वाले ब्लॉग मंत्री

- जयराम रमेश, सांसद (राज्य सभा)

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ब्लॉग मंत्री श्री अरुण जेटली ने कल आधार के जरिये प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) को लागू करने की प्रधानमंत्री मोदी की “निर्णयता” की सराहना की। इसके बाद उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस पार्टी और उसके वकीलों ने इसे अदालत में चुनौती दी और इसे ‘तकनीक विरोधी’ तथा ‘आधार विरोधी’ बताया। हमेशा की तरह जेटली जी का ब्लॉग झूठ, मनगढंत तथ्यों और तमाम फर्जी दावों से भरपूर था।


ब्लॉग मंत्री महोदय का रिकॉर्ड दुरुस्त करने के लिए ये बताना जरुरी है कि कांग्रेस पार्टी ‘आधार-विरोधी’ नहीं है। भाजपा के क्षत-विक्षत, एकतरफा आधार संस्करण, जो न केवल आधार के जरिये स्वतंत्र और खुले समाज के कल्याण के लिये विनाशकारी है बल्कि आधार को अनिवार्य बनाकर सर्वाधिक वंचित भारतीयों को अलग-थलग भी करता है, की बजाय कांग्रेस पार्टी आधार को सशक्त बनाने के लिए मजबूती से खड़ी है।


आधार विधेयक को धन विधेयक के रूप में पारित कराने के विशिष्ट मामले पर मुझे अंतिम उपाय के रूप में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करने पर मजबूर होना पड़ा। भाजपा सरकार ने संसद से आधार को पारित कराने के लिए सभी संसदीय प्रक्रियाओं को पांच दिनों तक बिना किसी ठोस या रचनात्मक चर्चा के खत्म कर दिया। विधेयक पारित होते समय श्री जेटली ने यह दावा करते हुए सदन के पटल पर साफ तौर से झूठ बोला कि महत्वपूर्ण विधेयकों को ‘धन विधेयक’ के रूप में पारित कराने का खुद कांग्रेस का इतिहास रहा है और दो ऐसे विधेयकों का उदाहरण दिया। हालाँकि, मैंने बाद में इस झूठ का राज्यसभा में खुलासा किया कि वित्त मंत्री द्वारा संदर्भित दो बिलों में से कोई भी वास्तव में धन विधेयक के रूप में पारित नहीं कराया गया था, ये एनडीए सरकार की संसद और भारत की जनता को गुमराह करने की आदत को स्पष्ट तौर पर दर्शाता है।


देश के लोगों को पता होना चाहिए कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के अनुसार न्यायालय के सबसे सम्मानित न्यायाधीशों में से एक, न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ ने एनडीए के आधार विधेयक को ‘संविधान के साथ धोखा’ बताया और सरकार को सत्ता के मनमाने इस्तेमाल के खिलाफ चेताया था। यह एक प्रकार से कानून की असहमति तो है ही, इसके अलावा यह संवैधानिक संस्थानों को कमजोर किये जाने पर टिप्पणी है, जो इस सरकार की आदत बन चुकी है।


इसके अलावा, यह फैसला यूपीए सरकार के आधार के नजरिये की भी पुष्टि करता है, जो इसे स्वैच्छिक और पारदर्शी ठहराता था। धारा 57 को रद्द करके उच्चतम न्यायालय ने मोदी सरकार द्वारा ताकझांक वाला देश बनाने और पीएम मोदी के करीबी पूंजीपतियों को करोड़ों भारतीयों की निजी जानकारियों को सौंप कर उनकी निजता से समझौता करने की कोशिशों को खत्म कर दिया।


आधार नेटवर्क के माध्यम से डीबीटी की परिकल्पना संभावित लीकेज को रोकने और न्यूनतम लागत पर अधिकतम कल्याण लोगों तक पहुंचाने के लिये की गई थी। यह पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का सपना था कि हर नागरिक को उसका सही हक सरकार द्वारा मिले। यह इसी उद्देश्य से तैयार किया गया था और सरकार की सब्सिडी वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार और गड़बड़ी को खत्म करने के लिये ही यूपीए सरकार ने भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) की स्थापना की।


आधार की यूपीए की सोच हर एक नागरिक को एक विशिष्ट पहचान देकर सशक्त बनाने की थी, ताकि उसे उसका वाजिब हक मिल सके। पारदर्शिता, कार्यकुशलता और गोपनीयता आधार की बुनियाद थे, जो समाज के गरीब और कमजोर तबके को सशक्त बनाने के एकमात्र उद्देश्य से यूपीए सरकार समय लागू किये गये थे।


जहां तक इसके कार्यान्वयन का सवाल है तो यह मोदी सरकार की तरह एकतरफा ढंग से नहीं किया गया था, बल्कि यूपीए सरकार के दूरदर्शी नेतृत्व में 2014 तक 60 करोड़ आधार कार्ड जारी किए जा चुके थे और फरवरी 2013 में केंद्रीय बजट के दौरान 43 जिलों में 26 योजनाओं के लिये डीबीटी आधारित आधार की घोषणा पहले ही की जा चुकी थी। यूपीए ने डीबीटी के कार्यान्वयन के लिए एक सोचा-समझा, चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाया ताकि प्रणाली की त्रुटियों को कम से कम किया जा सके। हालांकि, तब से आधार का दायरा संशोधित हो चुका है और मौजूदा सरकार सब्सिडी वितरण से बड़े पैमाने पर लोगों को बाहर कर रही है और उसमें काफी अक्षमताओं व्याप्त हैं। यूपीए सरकार का ये दृष्टिकोण नहीं था।


यूपीए का आधार सशक्तिकरण का प्रतीक था, एनडीए सरकार ने उसे अब इसे लोगों को उनके हक से वंचित करने के साधन में बदल दिया है। चाहे वो सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजनाएं या राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के लाभार्थी हों, आधार से संबंधित दिक्कतों के चलते लोगों को निकाल बाहर करने के मामले दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं।


आधार को सार्वजनिक योजनाओं में शामिल करने के लिए सरकार की गैर-जरुरी जल्दबाजी तब सामने आयी, जब स्कूलों में मध्यान्ह भोजन का लाभ लेने के लिये इसे अनिवार्य कर दिया गया। इस प्रकार की योजना में आधार को शामिल करने का उद्देश्य आधारहीन है, क्योंकि इस योजना में अनियमितता का ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो योजना में बच्चों की उपस्थिति में अचानक उछाल जैसी बात को प्रमाणित करता हो। इसके अलावा, यह कदम इसलिये भी अतार्किक है क्योंकि यूआईडीएआई खुद मानता है कि 15 साल की उम्र तक बच्चों के बायोमेट्रिक्स बदलते हैं।


डीबीटी के संदर्भ में एनडीए सरकार की अलग-थलग करने की आदत का एक और पहलू दिव्यांगों और वंचितों के प्रति सहानुभूति की कमी है। नेत्रहीन या विकृत हाथ वाले लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था पर कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं दिया गया है। इसी तरह, निर्माण और कृषि मजदूर जो लंबे समय तक काम करते हैं, उनके हाथ अक्सर रुखे और कठोर हो जाते हैं जिसके कारण आधार प्रमाणीकरण में त्रुटियां भी होती हैं और इससे वो अपने जायज हक से वंचित कर दिये जाते हैं।


सर्वाधिक कमजोर और वंचित भारतीयों के जख्मों को कुरेदते हुए ब्लॉग मंत्री ने यहां तक दावा कर दिया कि, “आधार के इस्तेमाल से पिछले कुछ वर्षों से मार्च, 2018 तक 90,000 करोड़ रुपये की बचत हुई है। अपने इस सफेद झूठ को पुख्ता शक्ल देने के लिये उन्होंने विश्व बैंक की डिजिटल डिविडेंड रिपोर्ट के हवाले से कमजोर और खोखले आंकड़ों का सहारा लिया। जबकि भारत और विदेश दोनों जगहों के स्वतंत्र विश्लेषकों ने कहा कि बचत का ये अनुमान आधार से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि सब्सिडी हस्तांतरण में डिजिटल प्रौद्योगिकी के उपयोग से जुड़ा हुआ है, जिसमें स्मार्ट कार्ड का उपयोग आदि शामिल है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है यह अनुमान मानक से कहीं परे है क्योंकि इसे भारत सरकार के कुल कल्याणकारी व्यय बजट का दस गुना बढ़ाकर बताया गया है!


हालांकि, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब सरकार ने आधार आधारित डीबीटी बचत पर बढ़चढ़ कर दावे करने के लिए भ्रामक तथ्य पेश किये हैं और इन्हीं आंकड़ों का इस्तेमाल संसद में इसे धन विधेयक के रूप में पारित कराने में भी किया गया। मैंने ब्लॉग मंत्री के इसी तरह के झूठे दावों  (आधार बिल पर बहस के दौरान राज्य सभा में) कि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण योजना के कारण एलपीजी सब्सिडी में 14,672 करोड़ की बचत हुई, की पोल खोल कर रख दी थी। जैसा कि मैंने उस समय बताया था कि उस समय एलपीजी सब्सिडी में अधिकांश बचत वैश्विक स्तर पर एलपीजी की कीमतों में गिरावट के कारण हुई थी और इसमें आधार का हिस्सा बेहद मामूली था।


मेरे सही आंकड़ों के कारण ही तत्कालीन मुख्य आर्थिक सलाहकार को स्पष्टीकरण देना पड़ा, जिन्होंने सरकार को बताया कि इस बात की उम्मीद है कि भविष्य में एलपीजी सब्सिडी मद में सरकार को 12,700 करोड़ रुपये की वार्षिक बचत हो सकती है। उनका यह स्पष्टीकरण अपने बॉस के मनगढ़ंत दावों को छुपाने की बेकार कोशिश की तरह साबित हुआ। उस समय मेरी बात की पुष्टि ‘पहल योजना’ की सीएजी ऑडिट (अप्रैल-दिसंबर 2015) के द्वारा भी होती है, जिसमें यह निष्कर्ष निकाला गया कि कुल बचत का 92 प्रतिशत वैश्विक स्तर पर एलपीजी कीमतों में गिरावट के कारण हुआ था। बहरहाल, सरकार देश के लोगों को धोखा देती रही और जून 2017 में उच्चतम न्यायालय में एक फर्जी हलफनामा भी दायर किया कि आधार लिंकिंग के कारण दिसम्बर 2016 तक खजाने में 26,000 करोड़ रुपये से अधिक की बचत हुई है।


अंत में मैं भाजपा सांसद, डॉ. उदित राज द्वारा 19 जुलाई, 2017 को लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में एनडीए सरकार में ग्रामीण विकास मंत्रालय के अपने उत्तराधिकारी को उद्धृत करना चाहता हूं। इस सवाल पर कि क्या मनरेगा के तहत आधार आधारित सत्यापन न होने के कारण क्या 87 लाख से अधिक लाभार्थियों के नाम रद्द कर दिये गये और उस बचत का विवरण, इस सवाल पर मंत्री ने स्पष्ट रूप से उत्तर दिया “नहीं। प्रश्न नहीं उठता। इसके अलावा, इन्हीं मंत्री महोदय ने 7 जनवरी, 2019 को राज्यसभा में एक तारांकित प्रश्न का उत्तर दिया कि ‘‘मनरेगा के संबंध में आधार लिंकिंग के फायदों का मूल्यांकन करने के लिए ऐसा कोई अध्ययन मंत्रालय द्वारा नहीं कराया गया है। अब इसमें कोई शक नहीं है कि माननीय ब्लॉग मंत्री और सरकार दोनों देशवासियों से झूठ बोल रहे हैं।

(अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद)

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