Master of lies

Master of lies Fri, 22 Mar 2019

झूठों का सरताज : चोला, चेहरा, नारा बदलने से कभी देश का भला नहीं हो सकता

2014 में चुनावी सरगर्मी तेज थी और एक प्रचारक तथा उसके पीछे हजारों करोड़ रुपया बहाते हुए भारी-भरकम संसाधनों से लैस पूरा प्रचारतंत्र देशवासियों को ठगने के लिये एक के बाद एक वादे करता जा रहा था और वादे भी लच्छेदार नारों की चाशनी में लिपटे हुए थे जैसे - ‘अच्छे दिन आयेंगे’...


वादे भी हर किसी से किये गये चाहे किसान हो, युवा हों, व्यापारी हों, महिलाएं हों, कर्मचारी हों या हमारी सीमाओं की रक्षा करने वाले जवान हों। तब किसी को कतई ये आभास नहीं था कि ये सारे वादे उनको लूटने के लिये किये जा रहे हैं और इनमें से एक भी पूरा नहीं होने वाला। आईए उनके चंद वादों उर्फ जुमलों पर एक सरसरी निगाह डालते हैं


 15 लाख हर खाते में देने का वादा

० युवाओं को हर साल 2 करोड़ रोजगार का वादा

० काला धन खत्म करने का वादा

० आतंकवाद खत्म करने का वादा

 100 स्मार्ट सिटी बनाने का वादा

० किसानों को डेढ़ गुना दाम देने का वादा

० महंगाई खत्म करने का वादा

० चीन को लाल आंख दिखाकर बात करने का वादा

० गंगा की सफाई का वादा

.... और भी काफी कुछ।


हर तरफ नकारात्मकता फैलायी जा रही थी। देश के तत्त्कालीन प्रधानमंत्री के बारे में खुले मंचों से अशोभनीय बातें कहकर अठ्ठहास लगाया जा रहा था। मीडिया के हर मंच का भरपूर इस्तेमाल कर चुनावी फायदे के हिसाब से मनगढ़ंत खबरें सुर्खियां बनायी जा रही थीं।


चुनाव खत्म भी हुआ और देश की जनता ने वादों पर भरोसा करके भारी बहुमत वाली नयी सरकार चुनी। लेकिन नयी सरकार ने आते ही अपना असली रंग दिखाना शुरु कर दिया। लोगों का ध्यान असल मुद्दों से हटाकर फैंसी नारों की ओर मोड दिया गया। फर्जी खबरों, जान लेने पर उतारु उन्मादी भीड़तंत्र, सरकार के खिलाफ अपनी राय रखने वालों को देशद्रोही करार देने का काम शुरु हो गया। ऐसा माहौल बनाया जाने लगा मानो देश का जन्म ही 26 मई 2014 के बाद हुआ हो। पहले की सरकारों ने कोई काम नहीं किया। एक खास बात ये भी रही कि मौजूदा सरकार के शुरुआती दौर में कई बड़े कामों के फीते कटे जिसका श्रेय पूर्ववर्ती सरकारों को देने की बजाय उसे भी अपने खाते में जोड़ लिया गया।


हर साल 2 करोड़ रोजगार देने का वादा करने वालों के पिछले पांच साल में ही पौने पांच करोड़ लोगों की नौकरी छिन गयी। इस आंकड़े को सरकार दबाये रही। आखिर क्यों? क्योंकि उसे अपनी पोल खुलने का भय था।

क्या ये युवाओं से चोरी नहीं है?

 

संसद -

16वीं लोकसभा की ड्योढ़ी पर मत्था टेकने वालों ने देश की जनता द्वारा दी गयी बहुमत की ताकत का जमकर दुरुपयोग किया। बहुमत के बल पर विपक्ष की आवाज़ को कुचलने का काम हुआ। बजट को बिना चर्चा किये ही मनमाने तरीके से पास किया गया। महत्त्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयकों को वित्त विधेयक के तौर पर पारित कराया गया और सत्र के अंतिम दिन संविधान संशोधन विधेयक पेश करके उत्पादकता का खोखला दावा किया जा रहा है। लोकतंत्र में इसे संख्या बल का सीधा दुरुपयोग कहा जाता है।


देशवासियों ने अपनी आंखों से देखा कि किसानों की जमीन छीनने के लिये तीन बार भूमि अधिग्रहण कानून को बदलने की कोशिश की गयी, सूचना के अधिकार कानून को कमजोर करने की कोशिश की गयी, नागरिकता संशोधन विधेयक के जरिये देश के नागरिकों को बांटने की कोशिश की गयी। लेकिन सजग विपक्ष ने कम संख्या में होने के बावजूद संविधान से मिली ताकत के बल पर सत्ता को खुली चुनौती दी और सरकार को मुंह की खानी पड़ी।

 

प्रेस और अभिव्यक्ति -

स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारों की मंडली बना दी गयी। बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों को करीबी पूंजीपतियों की मदद से निहत्था बना दिया गया। खबरें निकालने वाले ही खबर बन रहे थे। सरकार के खिलाफ बोलना या सरकार से सवाल पूछना अघोषित अपराध हो गया था। अकेले पिछले साल 2018 में ही 3 पत्रकारों की हत्या कर दी गयी। 50 बार सेंसरशिप का डंडा चला। इंटरनेट रोकने की घटनाएं 20 बार हुईं। वैश्विक प्रेस फ्रीडम के मामले में भारत दुनिया के 180 देशों में 138वें स्थान पर पहुंच गया। मौजूदा सरकार का एक ही मंत्र है या तो गोदी मीडिया का हिस्सा बनो या फिर झेलो। 

 

संविधान और न्यायालय -

12 जनवरी, 2018 को सूर्योदय के बाद रोजमर्रा की तरह देश की सबसे बड़ी अदालत भी खुली और किसी को ये आभास नहीं था कि आजादी के बाद पहली बार सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश आम लोगों और मीडिया के सामने आकर न्याय मांगेंगे।


सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जजों जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस मदन लोकुर, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस रंजन गोगोई ने मीडिया से मुखातिब होकर प्रशासनिक अनियमितताओं और कामकाज में दखलंदाजी की बात कही। पत्रकारों के सवाल पर कि किस मामले को लेकर उन्होंने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा, जस्टिस कुरियन जोसेफ ने कहा कि यह एक केस के असाइनमेंट को लेकर था। यह पूछे जाने पर कि क्या यह सीबीआई जज जस्टिस लोया की संदिग्ध मौत से जुड़ा मामला है, कुरियन ने कहा, ‘हां’।


जस्टिस चेलामेश्वर ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘20 साल बाद कोई यह न कहे कि हमने अपनी आत्मा बेच दी है। इसलिए हमने मीडिया से बात करने का फैसला किया। भारत समेत किसी भी देश में लोकतंत्र को बरकरार रखने के लिए यह जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था सही ढंग से काम करे।


यानी यह बात साफ है कि मौजूदा सरकार में एक जज की संदेहास्पद परिस्थिति में हत्या हो जाती है और उस मामले की जांच के लिये आवाज़ उठाने पर वरिष्ठतम न्यायाधीशों को भी नहीं बख्शा जा रहा है।


पहली बार इस सरकार ने हैरान करने वाला काम किया। देश की सबसे बड़ी अदालत से भी झूठ बोल गयी ये सरकार। राफेल मामले में सुनवायी के दौरान जो कैग रिपोर्ट बनी ही नहीं थी उसे संसद में पेश करने और लोकलेखा समिति द्वारा जांचे-परखे जाने का झूठा हलफनामा दायर कर मनमाफिक फैसला करा लिया।

 

सरकारी संस्थान -

नोटबंदी का मनमाना फैसला करके मोदी सरकार ने पूरे देश को बेईमान बता दिया। छोटे दुकानदार, गरीब, महिलाएं यहां तक कि बच्चों के गुल्लक तक के पैसों को एक झटके में बर्बाद कर दिया गया। लाखों लोगों की नौकरियां छिन गयीं, काम-धंधे बंद हो गये। महिलाओं ने वर्षों से जो अपनी गाढ़ी कमाई का जो पैसा मुश्किल वक्त के लिये बचाकर रखा था उसे भी बदलवाने के लिये लोगों को लाईनों में कई दिनों तक खड़ा रहना पड़ा। सैंकड़ों निर्दोषों की जान चली गयी। हजारों बेटियों की शादी टूट गयी और प्रधानमंत्री मोदी ताली बजाकर हंसते रहे। लोगों के आसुंओं की उनको कोई परवाह नहीं हुई।


नोटबंदी का मनमाना फैसला आरबीआई से पूछे बिना किया गया। रिजर्व बैंक के गवर्नर कार्यकाल पूरा होने से पहले ही अपना इस्तीफा सरकार को सौंप कर चले गये।


विश्वविद्यालयों सहित महत्वपूर्ण सरकारी संस्थानों में एक खास विचारधारा के लोगों को उच्च पदों पर भर दिया गया। इस दौरान योग्यता को पैमाना नहीं माना गया बल्कि खास विचारधारा के प्रति समर्पण को ही अनिवार्य और वांछनीय योग्यता मानी गयी।


सांख्यिकी आयोग, नीति आयोग सहित दर्जनों सरकारी संस्थाओं में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों ने सरकार की मनमानी से दुःखी होकर इस्तीफा देने में ही भलाई समझी।


केन्द्रीय जांच ब्यूरो जिससे अपराधी थर-थर कांपते थे उसे इस सरकार ने पंगु बना दिया। आधी रात को सीबीआई के चीफ को ही उनकी कुर्सी से उठाकर फेंक दिया गया और अपने मनमाफिक व्यक्ति को कुर्सी सौंप दी गयी। सुप्रीम कोर्ट ने जब गलत तरीके से निकाले गये सीबीआई प्रमुख को दोबारा बहाल किया तो फिर सरकार ने अपनी ताकत का इस्तेमाल कर उनकी कुर्सी छीन ली। वजह साफ थी कि राफेल घोटाले की संभावित जांच में मोदी सरकार को अपनी कुर्सी जाने का खतरा नजर आ रहा था।

 

सशस्त्र बल -

मौजूदा सरकार ने देश की सुरक्षा में लगे जवानों को अपने राजनीतिक फायदे के लिये इस्तेमाल किया। राज्यों का चुनाव हो या फिर आम चुनाव हर बार भाजपा ने सशस्त्र बलों की आड़ लेकर भावनात्मक फायदा उठाने की कोशिश की।


राफेल घोटाला पूरी तरह से खुल चुका है और सरकार की चोरी पकड़ी जा चुकी है। लेकिन अपनी ताकत के बल पर वो खुद को बचाये हुए है और जहां कहीं भी उसे खतरा नज़र आता है वो उसे जड़ से खत्म कर देती है।


राफेल सौदे में प्रधानमंत्री घोटाले में इस कदर धंसे हुए हैं कि रक्षा मंत्रालय के कागजों तक में कहा गया है कि प्रधानमंत्री खुद रक्षा मंत्रालय को दरकिनार कर अपने करीबी पूंजीपति को कर्ज से उबारने और हजारों करोड़ का फायदा दिलाने के लिये राफेल सौदा पर समानान्तर बातचीत कर रहे थे।


जबकि प्रधानमंत्री मोदी के करीबी और कर्जदार पूंजीपति का लड़ाकू हवाई जहाज बनाने का कोई पूर्व अनुभव नहीं था और न ही उसके पास ऐसी कोई कंपनी थी। सौदा मिलने के चंद दिनों पहले उस पूंजीपति ने नयी कंपनी खोली थी। जाहिर है भ्रष्टाचार सिर चढ़कर बोल रहा है।


वन रैंक वन पेंशन के नाम पर हमारे जवान आज भी संघर्ष कर रहे हैं जिस प्रकार देश को वन टैक्स, वन नेशन के नाम पर 5 अलग-अलग टैक्स के जाल में फंसाकर तबाह कर दिया गया है। उसी प्रकार जवानों के साथ भी वन रैंक, वन पेंशन के नाम पर अलग-अलग पेंशन जैसा धोखा किया गया है।

 

आंतरिक लोकतंत्र और अनुशासन -

आंतरिक लोकतंत्र और सबसे अनुशासित पार्टी होने का दावा करने वालों को आईना दिखाने के लिये संत कबीर नगर के भाजपा सांसद का जूता कांड ही काफी है। जिसमें भाजपा के सांसद विधायक के बीच जमकर अश्लील गालियों का आदान प्रदान पूरे देश ने देखा और जूतों की बारिश का तो कहना ही क्या।


आंतरिक लोकतंत्र और अनुशासन के नाम पर अपमान करना ही भाजपा की फितरत है। जिसे भाजपा के शीर्ष नेता अपना मार्गदर्शक और गुरु कहते नहीं थकते उन्हीं का राजनीतिक करियर तबाह करके रख दिया। अब तो हालत ये हो गयी है कि उनका लोकसभा का टिकट भी उनकी मर्जी के बिना छीन लिया गया और छीनने वाला भी भाजपा का सर्वोच्च पदाधिकारी है।

 

चोला, चेहरा, नारा बदलने वाले अपनी जबान से फिरने वाले कभी देश का भला नहीं कर सकते

 

2014 में मोदी का नारा था अच्छे दिन आयेंगे

2015 में मोदी का नारा था सबका साथसबका विकास

2016 में मोदी का नारा था न्यू इंडिया

2017 में मोदी का नारा था मेरा देश बदल रहा है

2018 में मोदी का नारा था साफ नीयतसही विकास

2019 में मोदी का नारा है मैं भी चौकीदार


जरा सोचिए जो हर साल नारे बदलते हों, अपनी वादों पर खरे न उतरते हों वो कैसे किसी का भला करेंगे।

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