Modi's 'Neighbourhood First' Policy Completely Backfires

Modi's 'Neighbourhood First' Policy Completely Backfires Sat, 11 Aug 2018

मोदी की ‘पड़ोसी पहले’ की नीति पड़ी उल्टी

मई 2014 में निर्वाचित प्रधानमंत्री मोदी जी, जो विदेशी मामलों में बढ़चढ़ कर रुचि लेने के लिये जाने जाते हैं, ने अप्रत्याशित राजनयिक कदम उठाते हुए पड़ोसी देशों के नेताओं को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया। 2014 में ही बाद में उन्होंने भूटान, नेपाल (दो बार) और म्यांमार का दौरा किया, जबकि चीन और बांग्लादेश के राष्ट्रपति भारत आये। ‘पड़ोसी पहले’ की नीति को प्राथमिकता देते हुए प्रधानमंत्री मोदी पड़ोसी देशों के नेताओं के साथ अपने संबंधों पर व्यक्तिगत, करिश्माई और अधिकार वाली छाप छोड़ना चाहते थे। हालांकि, राजनयिक मोर्चे पर उस समय भी कुछ खास हासिल नहीं हुआ और चिंताजनक बात ये है कि सब कुछ नीचे ही गिरता जा रहा है।

Read this story in English

भारत-नेपाल

सितंबर, 2015 में भारत पर अनौपचारिक आर्थिक नाकाबंदी लगाए जाने के आरोपों के बाद बाद नेपाल के साथ संबंध गंभीर रूप से बिगड़ गए। कथित नाकाबंदी ने नेपाल के लोगों के मन में भारत की छवि पर गहरा धब्बा लगाया और ‘नये राष्ट्रवाद’ को जन्म दिया। इसके कारण नेपाल के लोगों ने दिसंबर 2017 में कम्युनिस्ट शासन को सत्ता सौंपने के लिये जनादेश दिया, जिसका नेतृत्व पीएम के.पी. ओली के हाथ में हैं। पीएम ओली, जो आर्थिक नाकाबंदी के दौरान सत्ता में थे, ने भारत की मांगों का कड़ा विरोध किया और उन्हें मानने की बजाय चीन के साथ व्यापार और पारगमन संधि पर हस्ताक्षर कर दिये। दिसंबर 2017 के दौरान एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए भारत ने यूएनएचआरसी में नेपाल में ‘राजनीतिक प्रक्रिया की कमी’, ‘न्यायेतर हत्याओं’ और ‘जातीय भेदभाव’ की शिकायत कर दी। प्रधानमंत्री ओली ने पुराने मुद्दों को उठाने के लिये जिनेवा में भारत की आलोचना की, और परोक्ष तौर पर इसके पीछे दुर्भाग्यपूर्ण इरादे का इशारा किया - जिसे कुछ लोगों ने नेपाल के राजतंत्र का समर्थन माना। हाल ही में चीन ने नेपाल में कई बड़ी परियोजनाएं हासिल की हैं, जबकि दूसरी तरफ भारत प्रायोजित परियोजनाओं पर हमले हुए हैं। मतभेद नयी ऊंचाइयों पर जा रहे या इसमें नयी गिरावट आ रही - संक्षेप में कहें तो संभवतः संघ परिवार घरेलू राजनीति का भगवाकरण करने की ही कोशिश नहीं कर रहा बल्कि राजनयिक संबंधों पर भी असर डाल रहा है। जुलाई, 2018 में, नेपाल के विदेश मंत्री ने नेपाल के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त नीलकंठ उपरेती को भारत में नेपाल का राजदूत बनाने का ऐलान किया, लेकिन प्रधानमंत्री ओली ने उनके हिंदू स्वयंसेवक संघ के साथ संबंध होने के चलते - जो इंडिया फाउंडेशन के साथ करीबी तौर पर जुड़ा हुआ है - अपनी मंजूरी नहीं दी और उनकी नियुक्ति अटक गयी।

भारत-मालदीव

जब से केंद्र में भाजपा की सरकार आयी है, मालदीव की विदेश नीति लगातार भारत से दूर होती चली गई और उसने चीन का रुख कर लिया। सितंबर 2014 में राष्ट्रपति शी जिनपिंग मालदीव जाने वाले पहले चीनी राष्ट्रपति बने। सितंबर 2014 में, चीन ने मेल हवाई अड्डे का अनुबंध भी हासिल कर लिया, जिसे भारत से छीन लिया गया था। 2015 में, मालदीव ने विदेशियों को जमीन का मालिकाना हासिल करने का कानून लागू कर दिया, और कानून की शर्तों तथा बीआरआई महत्वाकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए, चीन को इससे सबसे ज्यादा फायदा होने की उम्मीद है। अगस्त 2017 में, मेल के वाणिज्यिक बंदरगाह ने तीन चीनी पीएलए-एन जहाजों की मेजबानी की। दिसंबर 2017 में मालदीव ने पहली बार किसी भी देश के साथ एफटीए पर हस्ताक्षर चीन के साथ किया। चीन के साथ इस करीबी और भारत से दूरी का प्रमुख कारण फरवरी, 2018 में मालदीव के राजनीतिक संकट के दौरान भारत सरकार द्वारा सही ढंग से मामले को हैंडल न करना रहा है। मालदीव की सरकार की भारत से दूरी का असर इस तथ्य के रूप में देखा जा सकता है कि, हाल ही में, मालदीव सरकार ने भारत - जो उसका प्रमुख सैन्य और नागरिक सहायता प्रदाता रहा है - को कहा कि वो वहां से अपने सैन्य हेलीकॉप्टरों और कर्मियों को वापस बुला ले।

भारत-पाकिस्तान

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा ‘गले पड़ने’ की तमाम कोशिशों और पठानकोट में भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान का सर्वेक्षण करने के लिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों को आमंत्रित करने के बावजूद भाजपा सरकार को पाकिस्तान सरकार की तरफ से कोई उत्साहजनक संकेत नहीं मिले। जवाब में प्रधानमंत्री मोदी जी की अगुवाई वाली सरकार ने पाकिस्तान को ‘सबक सिखाने’ के लिए एलओसी पर सर्जिकल स्ट्राईक का सहारा लिया, और दोनों ही मामलों में पीएम मोदी की कोरी कूटनीति दिखाई दी। सीमा पर की गयी सर्जिकल स्ट्राईक ने पाकिस्तानी सेना को जरुर उकसाया और तथ्य भी इसकी पुष्टि करते हैं। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 23 जुलाई, 2018 तक एलओसी पर 942 बार संघर्षविराम उल्लंघन हुआ है, जो 2017 के आंकड़ों से कहीं ज्यादा है। साथ ही, 2015 से इन आंकड़ों की अगर तुलना की जाये तो रिपोर्टों के मुताबिक एलओसी पर युद्धविराम उल्लंघन की घटनाएं 500 प्रतिशत तक बढ़ गयी हैं। इसी तरह, जून, 2018 तक अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर सीमा पार से गोलीबारी की 450 घटनाएं हुईं जो 2017 की तुलना में 4.5 गुना अधिक हैं। इसके अलावा, मई 2018 में, पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में किशनगंगा हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट (केएचईपी) के उद्घाटन के संबंध में विश्व बैंक से शिकायत की और ऐसा तब हुआ, जब भारतीय विशेषज्ञों ने ‘नीमराना वार्ता’ को दोबारा शुरु किया था। मार्च 2018 में, पाकिस्तान में भारतीय राजनयिकों का लगातार उत्पीड़न होने की खबरें आ रही थीं। फरवरी 2018 में, पाकिस्तान ने भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव पर आतंकवाद से जुड़े और आरोप जोड़ने का फैसला किया।

हालांकि, भारत-पाकिस्तान संबंधों में चिंताजनक प्रवृत्ति सिर्फ भारत और पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान धीरे-धीरे, लेकिन लगातार भारतीय सहयोगियों को छिटका रहा है। अप्रैल 2018 में, पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने मालदीव का दौरा किया, जो दुर्लभ घटना थी। यह आपातकाल लगाए जाने के बाद किसी भी उच्चाधिकारी की पहली मालदीव यात्रा थी। जुलाई 2017 में, पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मालदीव का मुख्य अतिथि के रूप में दौरा किया और 1 करोड़ डॉलर की रक्षा मदद दी।


भारत-चीन

भाजपा और उससे जुड़े लोगों ने डोकलाम मामले में चीन पर कथित जीत को लेकर हालांकि खूब बयानबाजी की और अपनी छाती पीटी, लेकिन असलियत हमेशा की तरह काफी अलग थी। कथित ‘जीत’ के कुछ दिनों बाद ही भारत के विदेश सचिव ने विदेश मामलों पर संसदीय स्थायी समिति को बताया था कि ‘इस बात की संभावना थी कि उत्तरी डोकलाम में चीनी सैनिक मौजूद थे।’ मौजूदा विदेश सचिव श्री विजय गोखले ने इसकी पुष्टि की है। फिर भी प्रधानमंत्री मोदी की अगुआई वाली सरकार का ये एक और जुमला था, लेकिन ये राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। बड़ा सवाल ये है कि - यह सरकार देश के लोगों को कितना और गुमराह करेगी?

हालांकि, मोदी सरकार को अभी तक डोकलाम पर सही जवाब नहीं सूझ रहा है, इस बीच भारत-प्रशांत क्षेत्र में दूसरे गंभीर मुद्दे सामने आए हैं। चीन की तेजी से ‘बढ़ती ताकत’ और उसके ‘साहूकारी वाले साम्राज्यवाद’ पर बहस तेज हो रही है। चीन के ‘साहूकारी वाले साम्राज्यवाद’ का सटीक उदाहरण मालदीव है, जो इस समय अपने कुल कर्ज का 70 प्रतिशत चीन से हासिल किये हुए है। मालदीवियन अर्थव्यवस्था का पांचवां हिस्सा ब्याज भुगतान में चला जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत-प्रशांत क्षेत्र के भव्य शतरंज पर, नया और शानदार खेल चल रहा है। चीन दोहरी चाल चल रहा है, जहां वो बीआरआई पहल के हिस्से के रूप में बंदरगाहों और कस्बों का निर्माण करने की पेशकश करता है, लेकिन उसका असल इरादा जरुरी होने पर उनको अपनी रणनीतिक संपत्ति के रूप में इस्तेमाल करने का है। यूं तो सरसरी तौर पर बीआरआई सभी के लिये फायदेमंद नज़र आता है, लेकिन हकीकत ये है कि चीन अपने ‘साहूकारी वाले साम्राज्यवाद’ के चंगुल में भारत को जकड़ने की चाल चल रहा है।

हाल के ‘अनौपचारिक शिखर सम्मेलन’ संबंधों को सुधारने की कोशिश प्रतीत होते हैं। यह बदलाव दिल्ली द्वारा दिखाई गयी हड़बड़ी से समझा जाना चाहिए, जो इस बात का साफ इशारा है कि डोकलाम में वह नाकाम साबित हुआ है। पड़ोसियों ने चीन के लिए भारत छोड़ दिया है, और भारत के खिलाफ अस्थिर अमेरिकी विदेश नीति राष्ट्रपति ट्रम्प की कृपा पर निर्भर है, भारत की जमीन खिसकती जा रही है। इसके अलावा, बड़ी चिंता की बात ये है कि चीन और पाकिस्तान का नेतृत्व भी इस बात को निश्चित तौर पर समझ रहा है और गतिरोध के बावजूद भी वो एक इंच पीछे हटने को तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी की लापरवाही और नासमझियों के चलते भारत विदेशी नीति में काफी पिछड़ सा गया लगता है।

Volunteer with us
Follow us fb