SC’s Judgement: A Lesson in Liberty and Equality

SC’s Judgement: A Lesson in Liberty and Equality Fri, 07 Sep 2018

उच्चतम न्यायालय का फैसला : स्वतंत्रता और समानता के लिये सबक

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को तर्कसंगत बनाने पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला लंबे समय से लंबित था, लेकिन अब फैसला आया और आशा की किरण भी जगी है। लैंगिक या यौन रुझान के भेदभाव के बिना लोगों की स्वतंत्रता और समानता की इस मांग का कांग्रेस पार्टी ने लंबे समय से समर्थन किया है। संविधान में निहित स्वतंत्रता और अधिकार भारतीय नागरिक से संबंधित हैं और सबसे जरुरी बात ये है कि ये भारतीय नागरिकों की बात करते हैं, और उच्चतम न्यायालय के फैसले को इसी के आलोक में देखा जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय का फैसला सिर्फ यौन स्वायत्तता के बारे में नहीं है, बल्कि, समग्र दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह फैसला स्वतंत्रता, पहचान, धर्मनिरपेक्षता और बहुसंख्यकवाद पर कुशलतापूर्वक टिप्पणी भी करता है, जो भारतीय राजनीति के अन्य पहलुओं पर भी लागू होती है।

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स्वतंत्रता पर -

पांच न्यायाधीशों वाली खंडपीठ के सभी न्यायाधीशों के आदेश में स्वतंत्रता मार्गदर्शक सिद्धांत रहा। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने यौन स्वायत्तता को ‘व्यक्तिगत पसंद’ करार देते हुए इस बात पर जोर दिया कि इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता से अलग नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति रोहिंटन एफ. नरीमन ने यौन स्वायत्तता की इस स्वतंत्रता को गरिमा के साथ जीने के मौलिक अधिकार के बराबर बताया। न्यायमूर्ति डी.वाई. चन्द्रचूड़ ने नैतिक विचारों को ‘संवैधानिक व्यवस्था के लिये अभिशाप’ बताया जिसका अर्थ ये है कि भारतीय संविधान के तहत क्या अनुमत होगा, यह निर्धारित करने के लिए सही और गलत की सामाजिक परिभाषाओं का उपयोग नहीं किया जा सकता है। संविधान की भावना के आधार पर - ‘संवैधानिक नैतिकता’ और ‘परिवर्तनीय संवैधानिकता’ के माध्यम से समाज को बदलने में संविधान की भूमिका के बारे में बोलते हुए मुख्य न्यायाधीश ने भी इसका समर्थन किया।

पहचान पर -

सीजेआई ने इस बात को स्वीकार किया कि समलैंगिकता पहचान पर आधारित है और किसी पर अपनी छवि थोपने की बजाय लोगों की व्यक्तिगत पसंद का सम्मान करना चाहिए। न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने भी इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की सहज प्रकृति के आधार पर भेदभाव उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि लोगों की व्यक्तिगत पहचान को स्वीकार करना चाहिए और उसका सम्मान किया जाना चाहिए।

धर्मनिरपेक्षता पर -

न्यायमूर्ति रोहिंटन एफ. नरीमन ने अपने आदेश में एक और महत्वपूर्ण पहलू को छुआ, जिसने दशकों से भारतीय राजनीति और समाज को प्रभावित किया है। अपने आदेश में न्यायमूर्ति नरीमन ने कहा कि राज्य केवल उन मामलों के लिए दंडित कर सकता है जो अपराध के दायरे में आते हैं। न्यायपालिका आध्यात्मिक आधार पर पाप से संबंधित मामलों में नहीं देख सकती। न्यायमूर्ति नरीमन के मुताबिक, दोनों के बीच अंतर को समझने में की नाकामी का परिणाम है धारा 377। हमारे देश में, सभी धर्मों की एक बराबरी को धर्मनिरपेक्षता के रूप में देखा जाता है, लेकिन आमतौर पर यह धारणा यह समझने में विफल होती है कि धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद देश और धर्म के बीच फर्क था।

बहुसंख्यकवाद के खिलाफ -

बहुसंख्यकवाद के खिलाफ दृढ़ता से बोलते हुए भारत में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ‘जब समाज के किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को इस अधार पर दबाया जाता है.... कि उनकी स्वतंत्रता से बहुसंख्यकों के जज्बातों को ठेस पहुंचती है, जबकि वो व्यक्ति अपने ही दायरे में रहकर अपनी आजादी को जीना चाहता है तो इससे जिंदगी के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो जाता है।’’ इस कथन से यह स्पष्ट है कि अल्पसंख्यकों - चाहे उनकी संख्या कम ही क्यों न हो - को बहुमत की सनक के आधार पर किनारे नहीं किया जा सकता।

प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई वाली सरकार बनने के बाद से ही अभिव्यक्ति की आजादी और धार्मिक मान्यताओं की आजादी पर हमले के साथ ही लोगों की आजादी के साथ समझौता किया गया है, आरएसएस समर्थित सरकार देश भर में एक संस्कृति, एक भाषा, और जातिगत आधिपत्य के आधार पर एक पहचान को थोपना चाहती है, जो दूसरी पहचान को कमजोर करती है। देश के बुनियादी सिद्धांतों में से एक धर्मनिरपेक्षता पर मनमानी धार्मिक पहचान थोपने के लिये लगातार हमला हो रहा है और राजनीतिक और सामाजिक दोनों तरह की बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियां संस्थानों को कमजोर कर रही हैं। हालांकि, जब हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बरीकी से पढ़ते हैं, तो हमें ये साफ महसूस होगा कि इन सभी बीमारियों की दवा पहले से ही संविधान में बताई गयी है। हमें केवल अपने संस्थानों और संवैधानिक मूल्यों के साथ दृढ़ता से खड़े रहना होगा। हमारे पूर्वजों, जिन्होंने हमें यह ‘जीवंत दस्तावेज’ दिया, वास्तव में दूरदर्शी थे। हम मानते हैं कि यह भयभीत करने वाला लगता है, लेकिन ऐसा करना बेहद सरल है, बस हमें अपने संवैधानिक मूल्यों के प्रति अडिग रहना है। इसलिए, जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि ये व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मसला है और इसे लोगों पर ही छोड़ देना चाहिए, तो वे हमारे पूर्वजों की ही बात दोहरा रहे थे और केवल उन्हीं मूल्यों की पुष्टि कर रहे थे जो हमारे संविधान में पहले से ही निहित है। यदि हम अपने विश्वासों और मूल्यों का सम्मान करना चाहते हैं, तो पहले हमें दूसरों के विश्वासों और मूल्यों का सम्मान करना चाहिए। अगर हम स्वतंत्रता, गरिमा और बराबरी चाहते हैं, तो हमें दूसरों को स्वतंत्रता, गरिमा और बराबरी की अनुमति देनी चाहिए। न्यायसंगत समाज तब तक महसूस नहीं किया जा सकता, जब तक कि हम अपनी तरह ही अपने साथी नागरिकों की पंसद का ध्यान नहीं रखते।

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