This Bill Will Pass

This Bill Will Pass Fri, 08 Mar 2019

ये विधेयक पास होगा

वर्ष 2019 चल रहा है और अब सवाल ये नहीं है कि महिलाओं को विधायी पदों पर लाने की जरुरत क्यों हैसवाल ये है कि ये काम कब होगा। हमारी संसद में अभी भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद कम है और अब महिला आरक्षण विधेयक समय की सबसे बड़ी मांग हैजिसे जल्द से जल्द पूरा किया जाना चाहिए। और ऐसा करने के लिये ही हम इस विधेयक को तत्काल प्रभाव से पारित करना चाहते हैं। संविधान (एक सौ और आठवां संशोधन) विधेयक, 2008, जो यह सुनिश्चित करेगा कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हों।

 

विधेयक के अनुसार : 

आरक्षित सीटों का आवंटन संसद द्वारा निर्धारित प्राधिकारी द्वारा निर्धारित किया जायेगा - जिसका अर्थ है कि एक बार विधेयक पारित होने के बादयह निर्वाचित पदों पर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करेगा। 

 

लोकसभा और विधान सभाओं में आरक्षित कुल सीटों में से एक तिहाई सीटें अनुसूचित जातियों और जनजातियों की महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी: इससे समाज के सभी वर्गों और वर्गों की महिलाओं को फायदा होगा।

 

राज्य या केंद्र शासित प्रदेशों में अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में चक्रानुक्रम द्वारा आरक्षित सीटें आवंटित की जा सकती हैं: इससे यह सुनिश्चित होगा कि देश के इलाकों से महिलाओं को उचित अवसर मिल सके। 

 

जैसा कि स्पष्ट हैइस विधेयक से जमीनी स्तर से लेकर उच्च पदों तक सभी महिलाओं को फायदा होगाजिसके चलते उनके आसपास के समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। और इस प्रकार देखते हैं कि अब तकहम कहां पहुँचे हैं -

06 मई, 2008: विधेयक को राज्य सभा में पेश किया गया

09 मई, 2008: इसे संसद की स्थायी समिति को भेजा गया

17 दिसंबर, 2009: स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की

09 मार्च, 2010: विधेयक राज्य सभा में पारित हुआ

2014: 15वीं लोकसभा के विघटन के बाद यह विधेयक कालातीत हो गया

21 सितंबर, 2017: श्रीमती सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्षा के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर इस विधेयक को पारित करने का आग्रह किया और इसे अपना पूर्ण समर्थन दिया।

16 जुलाई, 2018: कांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने पीएम मोदी को पत्र लिखा और एक बार फिर इस विधेयक को पारित करने के लिए कांग्रेस पार्टी की ओर से बिना शर्त समर्थन की पेशकश की। लेकिन बहुमत होने के बावजूद भाजपा ने विधेयक पारित नहीं कराया।

 

2019 मेंकांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने कांग्रेस शासित सभी राज्यों में राज्य सरकारों के साथ पहले ही बैठक की और राजस्थान इस विधेयक को पारित करने की प्रक्रिया में हैजिसके लिए वहां हाल ही में जनवरी में बैठक हुई थी। कांग्रेस अध्यक्ष और कांग्रेस पार्टी महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। वर्ष 1992 पर नज़र डालें तो संविधान के 73वें और 74वें संशोधन को श्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने पेश किया और पारित कियाजिसके जरिये शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया गया। पहले के इस ट्रैक रिकॉर्ड और पार्टी की मौजूदा प्रतिबद्धता के साथहम बिल को प्रति हमारी उम्मीदों को हकीकत में बदलकर दिखायेंगे। 

 

महिलाएं सभी स्तरों पर देश का नेतृत्व करने में सक्षम हैं और उन्होंने हर स्तर पर अपनी क्षमताओं को बार-बार साबित भी किया है। इसक बानगी चंद उदाहरणों में ही देखने को मिल जायेगी -

 

स्वास्थ्य मंत्री: श्री जवाहरलाल नेहरू की पहली कैबिनेट में अमृत कौर (कांग्रेस)

प्रधान मंत्री: श्रीमती इंदिरा गांधी (कांग्रेस)

मुख्यमंत्री: यूपी की सुचेता कृपलानी (कांग्रेस)

रक्षा मंत्री: श्रीमती इंदिरा गांधी (कांग्रेस)

मुख्यमंत्री: शीला दीक्षित (कांग्रेस)


महिलाएं एक बार नहींबल्कि 5 बार कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। पहली महिला पार्टी अध्यक्ष एनी बेसेंट थींजबकि पहली भारतीय महिला अध्यक्ष सरोजिनी नायडू थीं। नेली सेनगुप्ताइंदिरा गांधी और सोनिया गांधी ने भी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के रूप में काम किया है। दूसरी ओरभाजपा में आज तक कोई भी महिला पार्टी अध्यक्ष नहीं बन पायीं। 

 

बेशकयह सब इस बात का छोटा सा उदाहरण मात्र है कि महिलाओं ने भारत में क्या हासिल किया और देश हर किसी के योगदान के कारण आगे बढ़ा है। एक अनुसंधान से पता चला है कि जिन ग्राम पंचायतों की निर्वाचित नेता महिलाएं हैं वहां महिलाओं के सरोकार वाले सार्वजनिक कामों पर अधिक निवेश किया गया हैजैसे कि पीने का पानीसार्वजनिक स्वास्थ्यस्वच्छताप्राथमिक शिक्षा और सड़केंऔर इन सभी कार्यों की गुणवत्ता गैर-आरक्षित ग्राम पंचायतों से कहीं अधिक थी। एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि ग्राम पंचायतों में महिलाओं के लिए आरक्षण से न केवल महिला उम्मीदवारों के खिलाफ मतदाताओं के बीच पूर्वाग्रह में कमी आई हैबल्कि इसके परिणामस्वरूप स्थानीय महिला नेताओं के चुनाव लड़ने और जीतने के समग्र प्रतिशत में भी बढ़ोत्तरी हुई है। इस प्रकार के उपाय भारत की महिलाओं के जीवन की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए काफी लंबा रास्ता तय कर सकते हैं और उनके परिवारों के कारण इसमें काफी सुधार हुआ है। 

 

जो कुछ भी अब तक हमने हासिल किया हैउसके बावजूदभारत को अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है। जहां संविधान सभा में 15 महिलाएं मौजूद थींवहीं 2019 में भारत में संसद के दोनों सदनों में केवल 91 महिला प्रतिनिधि हैं। लोकसभा में 542 सदस्यों में से केवल 66 महिलाएँ हैं। दूसरी ओरराज्यसभा में 237 सदस्यों में से महिला सांसद केवल 27 हैं। निर्वाचित पदों पर महिला प्रतिनिधियों का वैश्विक औसत 22.4 प्रतिशत हैजबकि भारत में यह राज्यसभा में महज 11 प्रतिशत और लोकसभा में महज 10.6 प्रतिशत है।

 

लाखों महिलाओं के सपनों के साथ ये आंकड़े अपने आप को बयां करने के लिये काफी हैं। यदि भारत को सही मायने में प्रगति करनी हैतो वह अब अपनी महिलाओं की और अधिक उपेक्षा नहीं कर सकता। हमें महिला आरक्षण विधेयक को हकीकत में बदलने में मदद करें। इस बिल को पारित करने में हमारी सहायता करें।

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