Why are our farmers distressed?

Why are our farmers distressed? Sat, 22 Dec 2018

हमारे किसान परेशान क्यों हैं?

कई पीढ़ियों से भारत में किसानों को सरकार की तरफ से सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाती रही है। नेहरू जी ने एक बार कहा था कि ‘‘बाकी सब कुछ इंतजार कर सकता है लेकिन कृषि नहीं।’’ कृषि सकल घरेलू उत्पाद के बड़े हिस्से में योगदान देती है और इस क्षेत्र के कल्याण पर हमारे नेताओं ने सबसे ज्यादा ध्यान दिया है। लेकिन, पिछले 4 वर्षों में हालात काफी बदल गये हैं। प्राथमिकता के लिहाज से किसानों को सबसे निचले पायदान पर रखा गया है। कर्ज के बोझ, नाकाफी समर्थन मूल्य और सरकारी उपेक्षा के खिलाफ रोज संघर्ष के साथ-साथ अब किसानों को एक नये मोर्चे जलवायु परिवर्तन पर भी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। हर रोज वह अपना सब कुछ दांव पर लगाता है, वो कड़ी मेहनत करके जिस फसल को तैयार करता है उसे बाढ़ या सूखे जैसी विनाशकारी प्राकृतिक आपदा में नष्ट होते देखने पर मजबूर हो जाता है। हताशा और निराशा के बावजूद वो फिर से अपने जीवन और आजीविका के लिये संघर्ष में जुट जाता है।

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पीएम चाहते हैं कि हम कुछ भी मान लें, लेकिन इतना तो साफ है कि जलवायु परिवर्तन एक निर्विवाद सच्चाई है और इसका असर किसानों तथा उनकी आजीविका पर काफी ज्यादा पड़ता है। पिछले एक साल में ही कई बार सूखा, बाढ़, बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि आदि ने देश के विभिन्न हिस्सों में बड़े पैमाने पर तबाही मचाई, जिससे कृषि और कृषि उपज को खासा नुकसान पहुंचा है। रातों-रात किसानों के पास जो कुछ भी था वो छिन गया। इसके चलते वो फसल खराबा, कर्ज के भयावह दुष्चक्र में फंस गये। ये बताने की जरूरत नहीं है कि कई सारे किसानों ने आत्महत्या करना ही मुनासिब समझा।


भारत का कृषि क्षेत्र खरीफ सीजन के दौरान मानसून की बेरुखी और जरुरी चीजों की कीमतों में गिरावट से गंभीर संकट का सामना कर रहा है। भाजपा सरकार द्वारा नियुक्त की गई दलवाई समिति की पहली रिपोर्ट, जिसमें जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का मूल्यांकन किया गया था, में यह भी बताया गया है कि भारत का कृषि क्षेत्र इस समय गहरे संकट में है, इसमें यह भी जोड़ा गया है कि 2004-14 के दौरान देश के कृषि क्षेत्र का अब तक का उच्चतम विकास हुआ।


केंद्र सरकार किसानों की दुर्दशा को लेकर पूरी तरह से उपेक्षात्मक रवैया अपनाये हुए है। वो अपने खुद के झूठ में ही उलझ गयी है और सत्ता हासिल करने के लिये लोगों से किये खोखले वादों को पूरा कर पाने में नाकाम साबित हुई है। पीएम मोदी ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था। लेकिन कृषि विकास में गिरावट और कृषि उपज में गिरावट के चलते यह दूर की कौड़ी नज़र आती है। भाजपा सरकार के सत्ता में आने के तुरंत बाद कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने संसद को बताया कि बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि के चलते 50 लाख हेक्टेयर में खड़ी फसलें प्रभावित हुई हैं। मंत्रालय ने यह अनुमान लगाया कि खाद्यान्न उत्पादन 85 लाख टन घटकर 2015 में 2570 लाख टन हो जायेगा, जो तीन वर्षों में सबसे कम है। एमएसपी का वादा भी किया गया था जो अधूरा रहा, किसानों को औने-पौने दाम पर अपनी फसल बेचने पर मजबूर होना पड़ा। नतीजा ये हुआ कि कर्ज का बोझ बढ़ने लगा और किसान खास तौर पर बाढ़ व सूखा प्रभावित इलाकों में कर्ज में डूबने लगे। किसानों के तेजी से बढ़ते विरोध-प्रदर्शनों से किसानों में फैले असंतोष को साफ महसूस किया जा सकता है। अकेले इस साल ही 5 बड़े किसान विरोध प्रदर्शन हुए। हालांकि उनकी सारी मांगों को सिरे से नज़रअंदाज कर दिया गया।


बिना किसी राहत के साल भर कड़ी मेहनत करने वाले किसान निःसंदेह हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यह प्रत्येक नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे हमारे किसानों का जीवन बेहतर बनाने के लिये हर संभव मदद करें।

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