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अच्छा और सरल कर नहीं

अधिक टैक्स वसूलना चोरी है। इस चोरी पर परदा डालने के लिये जटिल और उलझाऊ कर व्यवस्था एकदम सही तरीका है और यही तरीका ‘इज़ ऑफ डूईंग बिजनेस’, कर अनुपालन में सुधार आदि के नाम पर हम पर थोप दिया गया। सरकारी सेवाओं और कल्याणकारी प्रावधानों में संगत बढ़ोतरी के बिना ही जब कर राजस्व में वृद्धि की जाती है तो सरकार अपना अधिकार खो देती है और इसे सत्ता से बाहर करने की जरुरत हो जाती है।

जब वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के विचार को कांग्रेस ने रखा तो वो चाहती थी कि भारत में एकल कर प्रणाली लागू की जाये, ताकि लेखा से जुड़ी परेशानियां खत्म हो सकें; क्योंकि विभिन्न राज्यों में एक ही वस्तु पर अलग-अलग दर से टैक्स लगता था। कांग्रेस पार्टी इस कर की अधिकतम सीमा 18 प्रतिशत रखना चाहती थी, ताकि यह सभी लोगों के लिये सुविधाजनक हो, साथ ही भारतीय वस्तुओं की घरेलू मांग बनी रहे। मोदी जी के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने भी 15.5 प्रतिशत से कम दर रखने की वकालत की थी, जिसे सरसरी तौर पर नजरअंदाज कर दिया गया। भाजपा जब विपक्ष में थी तब उसने यूपीए सरकार को इसे लागू करने से रोकने में पूरा दम लगा दिया और यह सुनिश्चित किया कि यह किसी भी हाल में लागू न होने पाये। मोदी सरकार ने यह सुनिश्चित कर दिया कि इस एकल कर व्यवस्था को लागू करने की बजाय इसके नाम पर 5 या 6 दर वाली कर व्यवस्था लागू हो और इस प्रकार 0.25 प्रतिशत, 3 प्रतिशत, 5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत, 28 प्रतिशत और 40 प्रतिशत कर लागू कर दिया गया, जिसमें अधिकांश वस्तुएं और सेवाएं 18 प्रतिशत और 28 प्रतिशत जैसे उच्च कर दायरे में डाल दी गयी। पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के अनुसार ऐसा कांग्रेस के दृष्टिकोण को जानबूझकर बर्बाद करने की नीयत से किया गया, ‘‘एकल जीएसटी दर का मतलब एक मानक दर होनी चाहिए और डीमेरिट वस्तुओं के लिये एक मानक ‘प्लस दर’ तथा मेरिट वस्तुओं के लिये एक मानक ‘माईनस दर’ तथा कुछ वस्तुओं और सेवाओं को भी पूरी तरह से छूट दी जानी चाहिए।’’ इसके बजाय, ज्यादा से ज्यादा कर वसूलने की भूख में भाजपा ने यह धारणा बनायी कि दाल को अलग-अलग कर दायरे में बेचा जाना चाहिए, क्योंकि इसमें से कुछ ‘ब्रांडेड’ हैं। डिजाइनर दाल की ये सोच साधारण भारतीय के पेट में पचने वाली नहीं है। दुनिया में ज्यादातर सफल अर्थव्यवस्थाएं अपने कर स्लैब को एक या दो तक सीमित करके उनको प्रभावी ढंग से एकरूपता व अनुमानितता के साथ सुनिश्चित ढंग से लागू करती हैं, इस सच्चाई को समझने में हवा में उड़ रही मोदी सरकार नाकाम रही है।

कांग्रेस द्वारा परिकल्पित जीएसटी के दृष्टिकोण में निम्नलिखित व्यापक बुनियादी बातों को शामिल किया गया था -

  • एकल टैक्स दर - केंद्र और राज्य के लिये 5 की बजाय सामान्य एकल आधार, जो अधिकतम 18 प्रतिशत की कर सीमा के साथ सभी करों को शामिल कर लेगा।
  • सामान्य छूट - भाजपा की मौजूदा निजी लॉबिंग वाली जीएसटी व्यवस्था की बजाय केंद्र, राज्य और उत्पाद श्रेणियों के बीच एक समान छूट।
  • आसान अनुपालन - मौजूदा पेंचीदा जीएसटीएन की बजाय एकल, सबसे मजबूत जीएसटी नेटवर्क जहां हर कोई अपने जीएसटी को एक बार में दाखिल कर सके।

असल में, जो हालत हैं उसमें राजस्थान जैसी भाजपा शासित सरकार को भी जीएसटी दरों को समझने में खासी मुश्किल हो रही है कि वह कौन सी दर का इस्तेमाल करे। जयपुर नगर निगम में लगभग 200 करोड़ रुपये के ठेके फंसे हुए हैं, क्योंकि न तो ठेकेदारों को और न ही सरकारी अधिकारियों को समझ में आ रहा है कि निविदा बिलों पर जीएसटी की कौन सी दर लागू होगी, इसके बावजूद वे नाराज लोगों से बिना किसी हिचक के ये कह रहे हैं कि ये बेहद आसान है और प्रधानमंत्री जी जल्द ही तथाथित ‘गुड एंड सिंपल टैक्स’ को ठीक कर देंगे।

इस अच्छे और सरल कर को दाखिल करना व्यापारियों के लिये काफी जटिल और जोखिम भरा काम साबित हो रहा है। नये सिस्टम में आने वाले 75 लाख कारोबारियों में से केवल 35 लाख कारोबारी अगस्त के महीने में जीएसटी रिटर्न दाखिल कर पाये थे और इस प्रतिशत में जल्द सुधार होने की कोई संभावना नहीं दिखती, और ऐसा चार्टर्ड एकाउंटेंटों द्वारा भाजपा के इस ‘इज़ ऑफ डूईंग बिजनेस’ के विचार को समझने के लिये किराये पर रखी गयी फौज की कलाबाजियों के कारण नहीं हो रहा, बल्कि ई-गवर्नेंस और डिजिटल इंडिया पर मोदी सरकार के भारी-भरकम दावों के फेल होने से हो रहा है, जो जीएसटी फाईलिंग के लिये ऐसी वेबसाईट तक नहीं बना सकी जो कि बिना ठप हुए सही ढंग से काम करे। जिस कंपनी को इस अच्छे और सरल कर की फाईलिंग के लिये जीएसटी नेटवर्क बनाने का चुनौतीपूर्ण काम सौंपा गया था, ने माना कि वो समय और लोगों की कमी के कारण अपने फाइनल सॉफ्टवेयर का बुनियादी परीक्षण तक नहीं कर पायी। अगर वित्तमंत्री जेटली जी ने चुनावी वाहवाही बटोरने की चाह में जल्दबाजी दिखाने की बजाय संसद को लोकतांत्रिक ढंग से काम करने दिया होता तथा जीएसटी विधेयक पर चर्चा करने की अनुमति दी होती, तो शायद वे अपनी इस दयनीय टीम को थोड़ा और समय दे पाते। बजाय इसके, भारत की आम जनता तथा यहां के छोटे व्यापारियों को बिना सोचे-समझे बनायी गयी दोषपूर्ण नीतियों का आसान शिकार बनने के लिये छोड़ दिया गया।

जीएसटी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को तबाही के कगार पर पहुंचा दिया है, इसके कारण वर्ष 2017 की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि तीन साल के निचले स्तर 5.7 प्रतिशत पर पहुंच गयी, जो नोटबंदी की मार से पहले ही 6.1 प्रतिशत पर गिर चुकी थी। जीएसटी और नोटबंदी की दोहरी मार के चलते भारतीय व्यवसायों की नौकरी देने और रोजगार सृजन की क्षमता ही नष्ट हो गयी। ऑल इंडिया मैन्युफैक्चरर्स ऑर्गेनाइजेशन ने बड़े निर्यात-आधारित उद्योगों में 30 प्रतिशत नौकरियां खत्म होने, मध्यम और बड़ी बुनियादी ढांचा कंपनियों में 45 प्रतिशत नौकरियों का नुकसान होने और सूक्ष्म व लघु व्यवसायों में 35 प्रतिशत रोजगार खत्म होने की बात कही है। इस तिमाही में विनिर्माण वृद्धि महज 1.2 प्रतिशत रही है, जबकि पिछले वर्ष की इसी तिमाही में यह वृद्धि 10.7 प्रतिशत थी। भाजपा ने काफी हो-हल्ला मचाकर आधी रात को जीएसटी लागू किया, लेकिन अगले दिन से अनिश्चितता और भ्रम के कारण बाजारों में सन्नाटा पसर गया, करोबार या तो बंद हो गया या फिर पुराने स्टॉक को औने-पौने दाम पर बेचने की होड़ मच गयी। सरकार ने छाती पीट कर ये दावा किया कि सरकार को केवल अगस्त महीने में ही 93,000 करोड़ रुपये का भारी राजस्व मिला, लेकिन उसे इस बात की कोई चिंता नहीं थी कि उपभोक्ता व्यय में कमी और आयात में वृद्धि हो रही है।

जीएसटी में पचास प्रतिशत के तौर पर आधा हिस्सा मिलने से राज्य सरकारों को फायदा दिख रहा है और इसलिये वो अपने लोगों की तरफ से विरोध करने की बजाय मोदी सरकार की जबरन वसूली में मदद कर रहे हैं। इसके अलावा, राज्य इस बात को समझने में विफल हो रहे हैं कि यदि इन भारी करों की मदद से कोई आर्थिक बदलाव नहीं आता तो, उनको होने वाला फायदा भी स्थायी नहीं होगा।