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विदेश नीति

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पड़ोसी खो दिया?

2014 के आम चुनावों में भाजपा ने अपने घोषणा पत्र ने कहा था कि ‘‘पार्टी का मानना है कि दक्षिण एशिया की प्रगति और विकास के लिये इस क्षेत्र में राजनीतिक स्थिरता, प्रगति और शांति आवश्यक है।’’

प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण के समय भारत में सत्ता हस्तांतरण को देखने के लिये 8 प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्ष मौजूद थे। ऐसा करके प्रधानमंत्री ने पूरी दुनिया को यह जताने की कोशिश की, कि भारत के लिए उसके दक्षिण एशियाई पड़ोसी अहम हैं। लेकिन आगे चलकर आकर्षक दिखने वाला ‘पड़ोसी पहले का सिद्धांत’ परस्पर विरोधी विदेशी नीतिगत महत्वाकांक्षाओं के चलते अक्सर खोखला साबित हुआ।

पिछले तीन वर्षों पर निगाह डालें तो भारत की विदेश नीति ने सामरिक लाभ के मामले में कुछ खास हासिल नहीं किया है। ‘पड़ोसी पहले’ की नीति असल मायनों में बदलकर ‘पड़ोसी खोने’ पर पहुंच गयी और भारत अपने आस-पड़ोस में ही बिल्कुल अलग-थलग पड़ गया है। आज अधिकांश दक्षिण एशियाई देशों के बीच नयी दिल्ली के खिलाफ काफी सारी शिकायतें हैं। भारत पर छोटे पड़ोसियों को धमकाने और उनकी स्थानीय राजनीति में हस्तक्षेप करने की कोशिश को लेकर कई गंभीर आरोप लगाये गये हैं।

नेपाल से शुरू करते हैं, जिसने सितंबर 2015 में नया संविधान अपनाया। इसके विरोध में मधेसी प्रदर्शनकारियों ने नेपाल में आवश्यक आपूर्ति को ठप कर दिया। पड़ोसी देश ने भारत पर इस अघोषित नाकाबंदी का आरोप लगाया। यहां तक कि काठमांडू ने संयुक्त राष्ट्र में भी इसकी शिकायत कर दी, जिसके जवाब में संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने प्रतिक्रिया में कहा कि ‘‘बंदरगाह विहीन देश होने और मानवता के आधार पर नेपाल को मुक्त पारगमन का अधिकार है।’’ भारत पर के.पी. ओली सरकार को गिराने की कोशिश का भी आरोप लगाया गया, जिसके परिणामस्वरूप लंबे समय तक भारत को दोस्ताना सहयोगी के रूप देखे जाने की धारणा को नेपाल में भारी चोट पहुंची। इसके अलावा, ऐसे आरोप भी लगे कि भारत ने 2015 में श्रीलंका के चुनावों में गैर-जरुरी हस्तक्षेप किया था। खुफिया एजेंसी रॉ के कोलंबो स्टेशन प्रमुख को वापस बुलाने से भी बाद में अटकलों का बाजार गर्म हुआ। श्रीलंका में सरकार बदलने के बावजूद, अब श्रीलंका भारत का करीबी नहीं है, उसने हाल ही में ऐलान किया कि वह ‘न तो भारत का और न ही चीन का समर्थक’ है। हालांकि, नेपाल और श्रीलंका दोनों ने बाद में चीन से अपनी नजदीकियां दिखायीं।

बांग्लादेश के साथ हमारा संबंध ऐतिहासिक रूप से समृद्ध और गाढ़ा रहा है, उसमें भी तनाव के लक्षण नज़र आने लगे हैं। म्यांमार में रोहिंग्या संकट बढ़ने के साथ पहले ही संसाधनों की कमी से जूझ रहे बांग्लादेश ने मुस्लिम रोहिंग्या शरणार्थियों को अपनाने से इनकार कर दिया है। इस मानवतावादी संकट का समाधान प्रदान करने की दिशा में काम करने वाले भारत ने अपना पल्ला झाड़ते हुए म्यांमार सरकार का पक्ष लिया है। भारतीय राजनेताओं द्वारा सरकार से भारत की सदियों पुरानी मानवतावादी परंपराओं और शरणार्थी सिद्धांतों का सम्मान करने की दलीलों के बावजूद मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने भारत में शरण लेने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों को बलपूर्वक बाहर निकालने का इरादा भी जाहिर कर दिया है। 2015 में भूमि सीमा समझौते - 2011 के भूमि सीमा प्रोटोकॉल का उप-उत्पाद (यूपीए शासन की उपलब्धि) की सफलता के परिणामस्वरूप उत्पन्न इस पड़ोसी देश की सद्भावना अब धीरे-धीरे खत्म होती देखी जा सकती है।

अफगानिस्तान और मालदीव जैसे देशों के साथ भी भारत के राजनयिक संबंधों में खटास आ गयी है। एनडीए सरकार के पहले साल के दौरान जब अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी भारत आये थे, तब भारत-अफगानिस्तान सामरिक समझौते पर कोई प्रगति नहीं हुई थी, न ही उनकी इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच किसी महत्वपूर्ण द्विपक्षीय समझौते पर कोई हस्ताक्षर किये गये।

रुस के साथ भी भारत के संबंधों में गिरावट की शुरुआत हो गयी है। फ्रांस के साथ हाल में हुई लड़ाकू विमानों की खरीद और अन्य सैन्य साजो-सामान की अमेरिका से खरीद के परिणामस्वरूप पारंपरिक तौर पर भारत का यह रक्षा सहयोगी देश किनारे लगा दिया गया। यदि शीर्ष स्तर से बेहतर मार्गदर्शन किया जाता तो इस कूटनीतिक चूक से बचा जा सकता था। इसके चलते भारत-रूस के संबंधों में भारी दबाव आयी और प्रतिक्रियास्वरूप रूस ने पाकिस्तान के साथ अपने सैन्य संबंधों को गहरा कर दिया है। गोवा में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन-2016 में भारत विरोधी आतंकवाद के साजिशकर्ता के तौर पर पाकिस्तान के दो आतंकवादी संगठनों का नाम लेने की भारत की मांग को रूस से समर्थन नहीं मिला, जो कि दोस्ती में संभावित दरार का साफ संकेत है।

अब चीन पर आते हैं, हाल में चला डोकलाम गतिरोध हालांकि बिना किसी अप्रिय घटना के समाप्त हो गया, लेकिन गतिरोध के फिर से न उभरने की संभावनाएं धुंधली ही हैं। सेना के वापस होने के बाद आयी खबरों से पता चला है कि इस इलाके में पहले की तुलना में कहीं ज्यादा चीनी सैनिक अभी भी मौजूद हैं। इससे साफ हो जाता है कि मोदी जी के नेतृत्व में चीनी ड्रैगन को ठीक से नहीं संभाला गया।

जैसा कि स्पष्ट है, अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इस सरकार की तमाम दिखावेबाजी के बावजूद उपलब्धियों के नाम पर कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। जब चावल से भूसा अलग किया जाये तो ऐसी भयावह तस्वीर सामने आती है जिसमें विदेशी संबंधों में गंभीर टूटन साफ दिखायी देती है, खासकर दुनिया उन हिस्सों में जहां इसका महत्व सबसे ज्यादा है।

कुल मिलाकर, मौजूदा सरकार के तहत भारत और इसके उप-महाद्वीपीय पड़ोसियों के बीच संबंधों में गिरावट को एक अनुभवी टीकाकार ने कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया है कि, ‘‘छोटे पड़ोसियों को नियंत्रित करने के अति-उत्साह में, भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने उनके साथ भारत के संबंधों को पहले से भी बदतर बना दिया। भाजपा कब समझेगी कि बाहुबल की रणनीति परिपक्व और चतुर कूटनीति की जगह नहीं ले सकती है?’’