Indian National Congress represents the progressive soul of India. Read here all the major achievements of Congress Party in India

2010-14

1. भारत ने  2010 में दुनिया की सबसे बड़ी जनगणना, बायोमेट्रिक जनगणना 2011 की शुरूआत की
2. भारत की सबसे लंबी रेल (4286 किमी), विवेक एक्सप्रेस का 2011 में संचालन शुरू
3. 2012 में भारत की पहली इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल, अग्नि V को लॉन्च किया गया
4. भारत में निर्मित पहला विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत, 2013 में लॉन्च किया गया
5. मार्स ऑर्बिटर मिशन / मंगलयान, 2013 - भारत अपने पहले प्रयास में ही मंगल की कक्षा में पहुंचने वाला पहला देश बना
6. भारत के पहले महिला वाणिज्यिक बैंक, 'भारतीय महिला बैंक' ने अपना परिचालन 2013 से शुरू किया
7. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2014 में भारत को 'पोलियो मुक्त' घोषित किया

2000s

1. पुनीता अरोड़ा भारतीय सेना की पहली महिला लेफ्टिनेंट जनरल बनीं, 2004 

2. बुला चौधरी पांच महाद्वीपों को जीतने वाली दुनिया की पहली महिला तैराक बनीं, 2005

3. भारत-चीन युद्ध के दौरान सील किया गया नाथुला दर्रा 44 साल बाद व्यापार के लिए फिर से खोला गया, 2006

4. भारत अंतरिक्ष कक्षा से यान (एसआरई 1) वापस लाने वाले चंद देशों में से एक बना, 2007

5. भारत की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में प्रतिभा पाटिल ने शपथ ली, 2007

6. विश्व शतरंज चैंपियनशिप में विश्वनाथन आनंद निर्विवाद विजेता बने, 2007

7. चंद्रमा पर भारत के पहले मिशन, चंद्रयान 1 का सफलतापूर्वक शुभारंभ हुआ, 2008

8. अभिनव बिंद्रा ने पहला व्यक्तिगत ओलंपिक स्वर्ण पदक जीता, 2008

9. भारत ने सफलतापूर्वक एक साथ 10 उपग्रहों को एकल प्रक्षेपण में अंतरिक्ष की कक्षा में भेजने का विश्व रिकॉर्ड बनाया, 2008

10. टेस्ट क्रिकेट में सचिन तेंदुलकर सबसे ज्यादा और 12000 रन बनाने वाले पहले बल्लेबाज बने, 2008

11. मीरा कुमार लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं, 2009  

12. भारत की पहली परमाणु संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी, आईएनएस अरिहंत को लॉन्च किया गया, 2009

90s

1. केरल पूर्ण साक्षरता हासिल करने वाला पहला राज्य बना, 1991

2. सत्यजीत रे ने लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए मानद ऑस्कर जीता, 1992

3. आईएमएफ ने भारत को 6वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा दिया, 1993  

4. सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स सौन्दर्य प्रतियोगिता जीतने वाली पहली भारतीय बनीं, 1994  

5. वीएसएनएल ने जनता के लिए इंटरनेट सेवा शुरू की, 1995

6. भारत विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना, 1995

80s

1. चेचक का उन्मूलन हुआ, 1980

2. भारत का पहला दूरसंचार उपग्रह एप्पल प्रक्षेपित, 1981

3. राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) स्थापित, 1982  

4. दक्षिण गंगोत्री अंटार्कटिक अनुसंधान बेस का निर्माण, 1983  

5. राकेश शर्मा अंतरिक्ष यात्रा करने वाले पहले भारतीय बने, 1984

6. बछेन्द्री पाल माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला बनीं, 1984

7. भारत फास्ट ब्रीडर परमाणु रिएक्टर हासिल वाला दुनिया का 7वां देश बन गया, 1985

8. जवाहर नवोदय विद्यालय की स्थापना, इसकी परिकल्पना पूर्व प्रधान मंत्री श्री राजीव गांधी ने की थी, 1986

9. सुनील गावस्कर टेस्ट मैचों में 10,000 रन बनाने वाले पहले क्रिकेटर बने, 1987

10. भारत ने एशिया का पहला रिमोट सेंसिंग उपग्रह आईआरएस-1 ए प्रक्षेपित किया, 1988

11. केरल का कोट्टयम भारत का पहला पूर्ण साक्षर जिला बन गया, 1989

70s

1. बजाज ऑटो ने अपना 1,00,000वां वाहन बाजार में उतारा, 1970

2. भारतीय नौसेना के विनाशकारी आईएनएस राजपूत ने पाकिस्तानी पनडुब्बी पीएनएस गाज़ी को तबाह किया, 1971

3. भारत में पिन कोड की शुरुआत की गयी, 1972  

4. प्रोजेक्ट टाइगर - भारत का सबसे सफल पशु संरक्षण कार्यक्रम, 1973

5. ‘स्माइलिंग बुद्ध’ - भारत विश्व का 6वां परमाणु शक्ति सम्पन्न देश बन गया, 1974

6. ‘आर्यभट्ट’ - पहला भारतीय सैटेलाइट प्रक्षेपित, 1975

7. सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपेरिमेंट (SITE) प्रक्षेपित किया गया, इसके जरिये ग्रामीण भारत के लिए सूचना आधारित 8. टेलीविजन कार्यक्रम उपलब्ध कराये गये, 1975

8. शादी के लिए पुरुषों की न्यूनतम उम्र बढ़ाकर 21 साल और महिलाओं की 18 साल की गयी, 1976

9. माइकल फेरेरा ने मेलबोर्न में विश्व बिलियर्ड चैम्पियनशिप जीती, 1977

10. नेहरू तारामंडल की शुरुआत, 1977

11. मदर टेरेसा ने नोबेल शांति पुरस्कार जीता, 1979

60s

1. मिल्खा सिंह ओलंपिक रिकॉर्ड तोड़ने वाले पहले भारतीय बने, 1960  

2. भारत ने गुट-निरपेक्ष देशों की पहली बैठक का संचालन किया, 1961

3. भारत की फुटबॉल टीम ने स्वर्ण जीता और एशियाई खेलों में अपनी सर्वोच्च रैंकिंग पर पहुंच गया, 1962

4. पंडित नेहरू ने देश भाखड़ा-नांगल बांध परियोजना देश को समर्पित की, 1963

5. सुचित्रा कृपलानी पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, 1963

6. पहले भारतीय जेट ट्रेनर एचजेटी-16 ने उड़ान भरी, 1964

7. सीमा सुरक्षा बल का गठन किया गया, 1965

8. रीता फारिया मिस वर्ल्ड का ताज जीतने वाली पहली भारतीय बनीं, 1966  

9. पंडित रविशंकर ने भारत का पहला ग्रैमी पुरस्कार जीता, 1967

10. हर गोविंद खुराना शरीर विज्ञान या मेडिसिन के लिए नोबेल पुरस्कार जीता, 1968  

11. इसरो की स्थापना की गयी, 1969

इंडिया एट 70

स्वतंत्रता आंदोलन

बिपिन चंद्रा, मृदुला मुखर्जी और आदित्य मुखर्जी द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘इंडिया सिंस इंडिपेंडेंस’ के अंश:

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन संभवतः दुनिया का सबसे बड़ा जनांदोलन था। 1919 के बाद यह इस विचार पर खड़ा हुआ कि लोग राजनीति में और अपनी आज़ादी में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं। यह आंदोलन देश भर से बड़ी संख्या में लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करने में सफल भी रहा। गांधी जी ने लाखों लोगों को राजनीति में आने को प्रेरित किया था। वे मानते थे कि जन आंदोलन नेता नहीं बल्कि जनता करती है। चाहे यह साम्राज्यवादी शासन का अंत करने के लिए हो या फिर सामाजिक बदलाव के लिए। हालांकि, उनका यह भी मानना था कि ऐसे आंदोलनों की सफलता या असफलता काफी हद तक इनके नेतृत्व पर निर्भर करती है।

सत्याग्रह एक संघर्ष के तौर पर जनता की सक्रिय भागीदारी और इसमें शामिल नहीं होने वाले लोगों की सहानुभूति पर टिका होता है। दरअसल, हिंसक आंदोलन को तो मुट्ठी भर प्रतिबद्ध लड़ाके या लोग अंजाम दे सकते हैं लेकिन अहिंसक आंदोलनों में लोगों की बड़ी संख्या में भागीदारी जरुरी होती है।
यहां इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि भारत के लोगों को इस तरह के अभियान में शामिल रहने का अनुभव था। इसलिए भारतीय गणराज्य के संस्थापकों और आजादी की लड़ाई के अंतिम चरण का नेतृत्व करने वालों ने लोगों की राजनीतिक क्षमता पर पूरा भरोसा किया था। यही वजह है कि नेताओं ने आजादी के बाद भयानक गरीबी और अशिक्षा के बावजूद सबको वोट देने का अधिकार दिया।

विशाल जनभागीदारी वाले संघर्ष में, विचारधारा और इसके प्रभाव की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जन आंदोलनों में भागीदारी बढ़ाने के लिए यह जरुरी होता है कि इसमें विभिन्न राजनीतिक सोच और विचारधाराओं को समाहित किया जाए। इसके साथ-साथ इसमें अनुशासन और सांगठनिक मजबूती और एकता अनिवार्य है। इसमें एकाधिकार या तानाशाही नहीं चल सकती।

इन बातों को समझते हुए कांग्रेस न सिर्फ विचारधारा के स्तर पर मजबूत रही बल्कि अनुशासित भी रही। साथ ही संगठन के तौर पर इसने विभिन्न विचारधाराओं को खुद में समाहित करने से भी परहेज नहीं किया। कांग्रेस किसी एक वर्ग की नहीं बल्कि पूरे भारत की नुमाइंदगी कर रही थी। इसलिए यह किसी खास विचारधारा को सर्वोपरी मानने वाली नहीं थी। कई विचारधाराएं और राजनीतिक धाराएं इसमें थीं। यह महत्वपूर्ण है कि कभी भी गांधी जी ने इस पर वैचारिक एकाधिकार थोपने की कोशिश नहीं की। इसलिए कंाग्रेस विभिन्न विचारों, विभिन्न प्रतिबद्धताओं और विभिन्न क्षमताओं वाले लोगों को कुछ समान लक्ष्यों के आधार पर अपने साथ जोड़ने में कामयाब हुई।

कांग्रेस यह लक्ष्य पाने में इसलिए कामयाब हुई क्योंकि वह लोकतांत्रिक ढंग से काम कर रही थी। एक साथ संघर्ष में शामिल होने के बावजूद इसमें शामिल विभिन्न विचारों वाले लोगों के बीच लगातार सार्वजनिक बहस चलती रहती थी। ऐसा तब था जब वे कई बातों पर एकमत भी थे। आंदोलन को लेकर रणनीतियों के मामले में बहुमत के आधार पर फैसला होता था, लेकिन जो अल्पमत में थे उनकी राय का अपमान नहीं किया जाता था। जिनकी राय नहीं मानी जाती थी वे भी आंदोलन में इस उम्मीद में शामिल रहे कि कभी उनकी बात भी मानी जाएगी। जो समूह कांग्रेस के बाहर थे, उनका भी एक मुश्किल और दोस्ताना रिश्ता कांग्रेस से बन गया था। सिर्फ सांप्रदायिक, जातिवादी और अंग्रेजों के प्रति श्रद्धा रखने वाले दल ही कांग्रेस के खिलाफ रहे।

इसलिए स्वतंत्रता आंदोलन के रास्ते बने आजाद भारत में विभिन्न हितों और विचारों के बीच समझौता, सामंजस्य और सुलह की राजनीतिक परंपरा विकसित हुई। आजादी के बाद नेहरु ने इसी परंपरा के तहत राष्ट्रीय नीतियां बनाने के लिए काम किया।

राजनीति और राजनीतिक व्यवहार के ऊंचे आदर्श आंदोलन के ज़रिए स्थापित हुए थे। बड़े नेता जैसे दादाभाई नैरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, लोकमान्य तिलक, गांधी जी, भगत सिंह, जवाहरलाल नेहरु, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, सी. राजगोपालाचारी, आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण आदि ने आले दर्जे की नैतिक ईमानदारी का परिचय दिया था। नेतृत्व के स्तर पर यही नैतिक ताकत और नैतिक आदर्श थे जिसने आम जनता को आंदोलन से जोड़ा। इसमें शामिल होने वाले कार्यकर्ताओं ने अपनी पढ़ाई छोड़ थी, अपनी नौकरी छोड़ दी, अपना घर-बार छोड़ दिया और पूरा जीवन आंदोलन में लगा दिया। समग्रता से देखा जाए तो आंदोलन ने साधन और साध्य के बीच भी संतुलन साधा। आंदोलन ने समय के साथ आगे बढ़ने और बदलने की क्षमता अपने अंदर विकसित कर ली थी। लोगों की मांगों और शासकों की बदलती नीतियों के आधार पर आंदोलन ने कई बार अपनी रणनीतियों में व्यापक फेरबदल किया। इस तरह से देखा जाए तो यह आंदोलन कई तरह से मौलिक और बिल्कुल नया था,

हमारा संविधान

 गै्रनविल ऑस्टिन, भारतीय संविधान - राष्ट्र की नींव

‘‘लोकतंत्र, सहभागी सरकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून की नजर में समानता समाज के लिए क्रांतिकारी हैं। राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में शामिल सामाजिक-आर्थिक बराबरी भी इतनी ही क्रांतिकारी है। जमींदारी उन्मूलन, संपत्ति के अधिकार में बदलाव और शिक्षा व रोजगार में भेदभाव मिटाने से संबंधित संवैधानिक प्रावधान भी उतने की क्रांतिकारी हैं।’’

‘‘इस राष्ट्र की स्थापना करने वालों ने संविधान में राष्ट्र के आदर्शों और संस्थाओं को न सिर्फ स्थापित किया बल्कि इन्हें हासिल करने की प्रक्रिया भी स्थापित की। नए समाज का निर्माण सामाजिक-आर्थिक क्रांति के जरिए होना था, जिसमें संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं के जरिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया साथ-साथ चले।’’

‘‘भारतीय संविधान का राजनीतिक स्वरूप इतना अलग है कि इसे संक्षेप में बता पाना असंभव है। इसके गुण जैसे ‘अर्ध-संघीय’ और ‘वैधानिक विकेंद्रीकरण’ दिलचस्प हैं लेकिन चौंकाने वाले नहीं। संविधान सभा के सदस्यों ने खुद ही माना था कि संघ को लेकर वे किसी एक निश्चित खांचे में नहीं सोचेंगे। उनका मानना था कि भारत की समस्या बिल्कुल अलग हैं और ये ऐसी समस्याएं हैं जिससे दूसरे देशों का पाला नहीं पड़ा। उन्हें लगता था कि इसका समाधान संघीय ढांचे के पारंपरिक ढंग से नहीं हो सकता, क्योंकि इसमें एक स्थायी अर्थ का अभाव है। इसलिए संविधान सभा के सदस्यों ने अमेरिका, कनाडा, स्वीट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे संघीय देशों के अनुभवों में से वह लिया जो उन्हें लगता था कि भारत के लिए उपयुक्त है। इससे एक ऐसा और बिल्कुल अलग संघीय ढांचा बना जो भारत की जरुरतों के लिहाज से जरुरी था।’’

बिपिन चंद्रा, मृदुला मुखर्जी और आदित्य मुखर्जी द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘इंडिया सिंस इंडिपेंडेंस’ के अंश: संविधान सभा द्वारा भारत के लिए मजबूत केंद्र के साथ संघीय ढांचा चुनना परिस्थितियों की देन थी। बंटवारे के बाद देश भर में हो रहे सांप्रदायिक दंगों, खाद्य संकट, शरणार्थियों के पुनर्वास जैसी समस्याओं से निपटने और राष्ट्रीय एकता को बचाए रखने के लिए मजबूत केंद्र की जरुरत थी। सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए भी यह जरुरी था।

संविधान ने केंद्र और राज्यों के बीच टकराव रोकने के लिए वैधानिक शक्तियों का बंटवारा साफ-साफ करने की कोशिश की थी। इसमें विषयों की तीन सूची है। जो विषय केंद्र की सूची में हैं उनमें कानून बनाने का अधिकार भारतीय संसद को है। जो राज्यों की सूची में हैं उन पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों की विधानसभाओं को है। वहीं जो विषय समवर्ती सूची में हैं, उन पर दोनों कानून बनाने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन अगर कभी इस मामले पर टकराव की स्थिति आती है तो केंद्र की ओर से बनाए गए कानून को सर्वोपरि माना जाएगा।

भ्रष्टाचार उन्मूलन

श्री राहुल गांधी का लोकपाल विधेयक पर भाषण, 26 अगस्त 2011
माननीय अध्यक्षा जी
पिछले कुछ दिनों की घटनाओं से मैं बहुत व्यथित हूं। मौजूदा हालात के कुछ पहलुओं से मैं बहुत आहत हुआ हूं।
हम सब भ्रष्टाचार की व्यापकता को जानते हैं। भ्रष्टाचार हर स्तर पर है। गरीब व्यक्ति पर इसका सबसे ज्यादा बोझ पड़ता है, किन्तु इस बोझ से हर भारतीय छुटकारा पाना चाहता है। गरीबी को मिटाने के लिए भ्रष्टाचार से लड़ना उतना ही जरुरी है, जितना कि महात्मा गांधी नरेगा या भूमि अधिग्रहण जैसा कानून बनाना है। यह हमारे देश की तरक्की और प्रगति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
माननीय अध्यक्षा जी, महज़ इच्छा हमारे जीवन को भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं कर सकती। भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए एक व्यापक रूपरेखा को कार्यान्वित करने और एक संगठित सर्वसम्मत राजनीतिक कार्यक्रम को ऊपर से लेकर नीचे तक कार्यान्वित करने की जरुरत होगी। सबसे जरुरी बात यह है कि उसके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति की जरुरत होगी।
माननीय अध्यक्षा जी, पिछले कुछ वर्षों में मैंने देश के कोने-कोने का दौरा किया है। मैं देश के सैंकड़ों लोगों से चाहे गरीब हो या अमीर वृद्ध हो या नौजवान, सशक्त हो या निशक्त से मिला हूं, जिन्होंने व्यवस्था से मोहभंग को अभिव्यक्त किया है। हमारी व्यवस्था से उपजे रोष को अन्ना जी ने आवाज़ दी है। मैं इसके लिए उनका धन्यवाद करता हूं। मैं समझता हूं कि हमारे सामने सही सवाल यह है कि क्या हम जनप्रतिनिधि भ्रष्टाचार के खिलाफ इस सीधी जंग के लिए तैयार हैं? यह सवाल केवल इस गतिरोध के थमने का नहीं है। यह एक बड़ी लड़ाई है। इसमें कोई सरल उपाय नहीं है। भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए निरन्तर प्रतिबद्धता और गहरी संबद्धता की जरुरत है।
पिछले दिनों की घटनाओं का साक्षी होने पर कदाचित ऐसा प्रतीत होता है कि एक कानून बन जाने से जैसे पूरे समाज से भ्रष्टाचार मिट जायेगा। मुझे इस बात पर गहरा संदेह है।
एक प्रभावकारी लोकपाल कानूनी तौर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ने का एक माध्यम है। किन्तु सिर्फ लोकपाल भ्रष्टाचारहीन आचरण के लिए पर्याप्त विकल्प नहीं हे। कई प्रभावकारी कानूनों की जरुरत है। ऐसे कानून जो कि कुछ जरुरी मसलों को लोकपाल के साथ ही साथ संबोधित करे -
  1. चुनाव और राजनीतिक दलों का सरकार द्वारा वित्तीय संचालन।
  2. सार्वजनिक खरीद में पारदर्शिता।
  3. भूमि एवं खनन जैसे मामलों का सही नियमन जिसके अभाव में भ्रष्टाचार पनपता है।
  4. न्यूनतम समर्थन मूल्य, राशन कार्ड और वृद्धावस्था पेंशन जैसे सार्वजनिक वितरण सेवाओं में समस्या निवारण की प्रक्रिया के लिए एक व्यापक तंत्र बनाना और
  5. कर चोरी से छुटकारे के लिए निरन्तर कर प्रणाली में सुधार।
हम समयबद्ध तरीके से संसदीय प्रक्रिया के माध्यम से दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ऐसे कानून बनाने के लिए देश की जनता के प्रति प्रतिबद्ध हैं।
हम एक लोकपाल नियामक की चर्चा करते हैं लेकिन हमारी चर्चा लोकपाल की जवाबदेही और उसके भ्रष्ट होने की स्थिति पर आकर थम जाती है।
माननीय अध्यक्षा जी, हम केन्द्रीय चुनाव प्राधिकरण की तरह संसद के प्रति जवाबदेह संवैधानिक लोकपाल के गठन पर चर्चा क्यों नहीं कर सकते? मुझे लगता है कि इस पर गंभीरता से विचार करने का समय आ गया है।
माननीय अध्यक्षा जी, कानून और संस्थान पर्याप्त नहीं हैं। भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए प्रतिनिधित्व-कारी, समावेशी और सुगम लोकतंत्र की जरुरत है।
आज़ादी और देश की प्रगति के लिए कई व्यक्त्यिों ने देश के लोगों को प्रेरित और आंदोलित किया है। किन्तु व्यक्तिगत भावना चाहे कितने भी अच्छे उद्देश्य के लिए हो, उससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमज़ोर नहीं होनी चाहिए। यह प्रक्रिया लम्बी और कठिन है किन्तु उसका लम्बा होना उसके समावेशी और निष्पक्ष होने के लिए जरुरी है। वह प्रक्रिया एक पारदर्शी औश्र समावेशी माध्यम बने जिससे विचारों को कानूनी रूप दिया जा सके। चुनी हुई सरकार ही संसद की उच्चता का संरक्षण करती है। नीतिगत घुसपैठ संसदीय उच्चता को नष्ट करेगी औश्र यह लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक होगा। आज प्रस्तावित कानून भ्रष्टाचार के खिलाफ है। कल को ऐसी लड़ाई किसी ऐसे लक्ष्य के प्रति भी हो सकती है जिसमें कि सबकी सामूहिक सहमति ना हो। वह लड़ाई हमारे बहुआयामी समाज और लोकतंत्र पर हमला हो सकता है।
हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि हमारा लोकतंत्र है। यह हमारे देश की आत्मा है। मुझे लगता है कि हमें और हमारे राजनीतिक दलों को और अधिक लोकतंत्र की जरुरत है। मैं राजनीतिक दलों के सरकारी वित्त प्रबंधन को मानता हूं। मैं युवाओं के सशक्तिकरण को मान

घटी मतदान की उम्र

“भारत एक प्राचीन देश और युवा राष्ट्र है। मैं भी युवा हूं, मेरा भी एक सपना है। मैं सपना देखता हूं कि भारत स्वतंत्र, मजबूत और आत्मनिर्भर राष्ट्र बने। यह मानव सेवा में दुनिया के अन्य देशों से अग्रणी हो।”
राजीव गांधी
पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने 1989 में मतदान की उम्र को 21 वर्ष से घटा कर 18 वर्ष कर दिया था। राजीव गांधी के इस ऐतिहासिक फैसले से ने राष्ट्र के विकास और निर्णय लेने की प्रक्रिया में देश के युवाओं को भागीदार बनाया।
1950 से संविधान के अनुच्छेद-326 के तहत संसद और राज्य विधानसभाओं का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर करने का प्रावधान है। उसमें कहा गया है कि मतदान करने वाले व्यक्ति की उम्र कम से कम 21 वर्ष होनी चाहिए।
संविधान के (62वें संशोधन) विधेयक, 1988 में लाने के संलग्न उदेश्यों और कारणों को उद्धृत करते हुए कहा गया, “वर्तमान युवा साक्षर और प्रबुद्ध है। मतदान की उम्र कम करने से देश के उन युवाओं को भी मौका मिलेगा जो अपनी भावनाओं को राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बनाना चाहते हैं।’’ 28 मार्च, 1989 को संविधान में 61वां संशोधन किया गया और अनुच्छेद 326 को संशोधित करते हुए इसमें ‘21 वर्ष के स्थान पर 18 वर्ष’ जोड़ा गया।
राजीव जी ने मतदान की उम्र कम करने में मदद की। उन्होंने देश के युवा से बाहर आने और उच्च मतदान सुनिश्चित करने की इच्छा को व्यक्त किया था। ऐसा करके उन्होंने राष्ट्र निर्माण में एक बड़ी भूमिका निभाई। इससे हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को अधिक समावेशी और मजबूत बनने में मदद मिली।

समान आर्थिक अवसर

17 जून, 1985 को श्री राजीव गांधी आईएलओ में

 मुझे खुशी है कि आज की सुबह मैं आप लोगों के साथ हूं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (आईएलओ) सभी सरकारों, कर्मचारियों और नियोक्ताओं को एक साथ लाता है। आईएलओ उनके अधिकारों के लिए लड़ता है जो श्रम के जरिए अपने देश और लोगों के लिए धन पैदा करते हैं। मैं आप सबका आभारी हूं जो आपने मुझे इस सत्र को संबोधित करने का विशेष अवसर दिया। मैं जिनेवा के केंटन अधिकारियों और स्विट्जरलैंड की संघीय सरकार को भी धन्यवाद करता हूं।

शोषित, गरीब और हाशिए पर मौजूद लोगों ने कई महत्वपूर्ण जीत हासिल की हैं। उनका संघर्ष फिर भी जारी रहना चाहिए। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में अभी गरीबी से त्रस्त लाखों लोगों को बुनियादी मानवीय जरुरतों की पूर्ति नहीं की जा रही है। विश्व के कुछ भागों में भुखमरी एक ज़मीनी हकीक़त है। पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के बेचैन चेहरे भोजन की तलाश करते रहते हैं। यह हमारी मौजूदा विश्व व्यवस्था के लिए एक अभियोग है। बहुत सारी उपलब्धियों के बीच व्याप्त विरोधाभास का हल किया जाना अभी बाकी है।

यहां हम व्यापक परिप्रेक्ष्य में आईएलओ की भूमिका पर विचार कर रहे हैं। हम यहां अनिवार्य रूप से क्या कर सकते हैं? क्या हम अपनी बड़ी उपलब्धियों को वर्तमान समय के प्रमुख मुद्दों से जोड़ कर देख सकते हैं।

आईएलओ का मूल उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से सामाजिक न्याय और शांति को सुरक्षित रखना है। आईएलओ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा श्रम को शोषित किए जाने की प्रतिक्रिया का स्वरूप ही हैं। जिस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ की परिकल्पना पूरे विश्व में शांति बनाए रखने की विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए हुआ, उसी प्रकार आईएलओ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा शोषित किए जाने वाले श्रमिकों के हितों का ध्यान रखने के लिए बनाया गया। हमे ऐसी ऐसी उम्मीद व्यक्त करनी चाहिए कि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की घड़ी आ गई है।

कुछ समय पहले से ही ऐसा लग रहा था। सशस्त्र संघर्ष कभी खत्म नहीं हो सकता और विकास का मुद्दा हमेशा किसी आसान रास्ते से नहीं गुजरता। फिर भी बहुपक्षीय संस्थाओं के माध्यम से सामूहिक कार्रवाई की सकारात्मक शक्ति में हमें भरोसा है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर में कई ऐसे आदर्श हैं जो अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और विशेष एजेंसियों के प्रेरणास्रोत हैं। विश्व कई संकटों से उबरा है। विश्व जनमत ने एक बड़े सहकारी प्रयास के जरिए युद्ध संकट और युद्ध की चाहत को समाप्त किया है।

आज शांति और समृद्धि के लिए संयुक्त अंतर्राष्ट्रीय प्रयास के समक्ष बड़ी चुनौती खड़ी है। हम बहुपक्षवाद से पीछे हटते हुए वैश्विक संगठनों को देख रहे हैं। संदेह, कलह और मतभेद हमारी प्रणाली पर हावी हो रहे हैं। विश्व में एकरूपता के लिए दबाव बनाए जा रहे है। वैश्विक नीतियों के व्यापक प्रभावों पर विचार विकसित देशों में अनिच्छा दिखाई पड़ती है। अविकसित और छोटे देशों को विकसित करने योजना पर विचार नहीं किया जा रहा है। जिस कारण हमें वैश्विक आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। अन्योन्याश्रय को सार्वजनिक रूप से तो प्रकट किया गया है लेकिन इसे व्यवहार में नहीं उतारा गया है। आपसी सहयोग की बातचीत की प्रक्रिया को भी गंभीर प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है।

द्वितीय विश्व युद्ध के 40 साल बीतने के बाद भी मानव जाति का भविष्य परमाणु प्रलय के अंधेरे में खोया हुआ है। बेवजह हथियारों का बोझ बढ़ रहा है। विनाश के भय से दुर्लभ संसाधनों के साथ खिलवाड़ हो रहा है और धन के अभाव में विकास रुका हुआ है।
क्या इससे निकलने का कोई रास्ता नहीं है?

हम भारतीय सोचते हैं कि वर्तमान संकट के समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों का नवीकरण करना होगा और इसके प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखानी होगी। आईएलओ, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का सबसे पुराना प्रतिनिधि है। यह एक उपयुक्त मंच हैं जहां हम संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने विश्वास को दोहरा सकते हैं। हम खुद को सभी की प्रगति और समृद्धि के लिए समर्पित करना होगा। मानव जाति के कल्याण और विश्व शांति के लिए हमें भविष्य की ओर देखना होगा और तेज कदमों से आगे बढ़ना होगा।

भारत ने, जो कि आईएलओ का संस्थापक सदस्य है, अपनी राष्ट्रीय नीतियों में इन उद्देश्यों समावेशित किया है। हमने अपनी आजादी जन आंदोलनों के माध्यम से ही पाई है। जिसमें औद्योगिक श्रम और ग्रामीण श्रमिकों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी। संविधान बनाने वक्त हमने घोषणा की कि राज्य ‘काम की मानवीय स्थितियों’ को हासिल करने का प्रावधान रखें। इसके अलावा सभी क्षेत्रों के श्रमिकों चाहें वे कृषि, औद्योगिक या फिर अन्य जगहों पर ही क्यों ना काम करते हो, को उचित मजद

समाजिक समानता का निर्माण

महिला सशक्तिकरण
‘आज़ाद होने के लिए महिलाओं को खुद में आजादी महसूस करनी होगी। पुरुषों के मुकाबले में नहीं बल्कि खुद और खुद के व्यक्तित्व के संदर्भ में।’
श्रीमति इंदिरा गांधी, 26 मार्च, 1980 को नयी दिल्ली में ऑल इंडिया वूमंस कॉन्फ्रेंस बिल्डिंग कॉम्पलेक्स के उद्घाटन के अवसर पर 1950 में लागू हुआ हमारा संविधान महिलाओं की मुक्ति और सशक्तिकरण का नया रास्ता तैयार करता है। महिलाओं को 1952 से देश के पहले आम चुनाव में मत देने का अधिकार दिया गया।

महिलाओं को मुक्ति दिलाने में भारत की सफलता का श्रेय पंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकायों को जाता है। जमीनी स्तर पर उन्हें सशक्त बनाने के लिए श्री राजीव गांधी को हमेशा याद किया जाएगा। उन्होंने कहा था, ‘भारत के ग्रामीण इलाकों में आधे से अधिक काम महिलाएं करती हैं। परिवार से संबंधित कल्याणकारी कार्यों और वित्तीय मामले महिलाओं के हवाले ही होते हैं। ग्रामीण भारत की महिलाएं ही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी संवाहक हैं। हमारी सभ्यता को बचाए रखने और उन्हें विकसित करने के लिए नैतिक मूल्यों को को बनाए रखने का काम भी महिलाएं ही करती हैं। क्या हमें महिलाओं के लिए लोकतंत्र के सबसे निचले स्तर में आरक्षण का प्रावधान नहीं करना चाहिए ताकि आने वाले दिनों में उन्हें ऊपर के स्तर पर इसका लाभ मिल सके?’

1993 में कांग्रेस ने 73वां और 74वां संविधान संशोधन लाकर स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित कर दीं। आज इन निकायों में पद पर बैठी महिलाओं की संख्या तकरीबन 12 लाख है। इनमें से कई ऐसी हैं जो वंचित तबकों से आती हैं। लंबे समय से चल रहे सत्ता समीकरणों में बदलाव आ रहा है।

कांग्रेस विधायिका में महिलाओं को आरक्षण देने के लिए प्रतिबद्ध है। हमने राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराया है और यह हमारी प्रतिबद्धता को दिखाता है। हमें उम्मीद है कि इस मसले पर राजनीतिक सहमति बनेगी और महिलाओं को बड़ी लोकतांत्रिक संस्थाओं में अधिक हिस्सेदारी मिलेगी।

महिलाओं को शोषण और हिंसा से बचाने के लिए आजादी के बाद कई कानून लागू किए गए:

क.  1950 में पंडित जवाहरलाल नेहरु की सरकार ने मानव तस्करी रोकने वाले अंतर्राष्ट्रीय समझौते पर दस्तखत किया और इसे भारत में लागू किया।
ख.  1956 में संसद ने महिलाओं और लड़कियों की अनैतिक तस्करी संबंधी कानून पारित किया। इसे श्री राजीव गांधी की सरकार ने 1986 में अनैतिक तस्करी निरोधी कानून के तौर पर संशोधित किया।
ग.  1961 में दहेज प्रतिबंध कानून पारित हुआ। इसका मकसद था दहेज प्रथा को रोकना। यह पुरुषवादी समाज का प्रमुख तत्व था।
घ.  राजीव गांधी के कार्यकाल में ही 1986 में महिलाओं के अश्लील चित्रण रोकने संबंधी कानून और 1987 में सती निरोधी कानूनी को पारित किया गया।
ड.  यूपीए की पहल पर 2005 में महिलाओं को घरेलू हिंसा से सुरक्षा संबंधी कानून पारित किया गया।
च.  कार्यस्थल पर महिलाओं को यौन शोषण से बचाने संबंधी कानून 26 फरवरी, 2013 को संसद ने पारित किया।
जाति आधारित शोषण रोकना  "भारत के लोग दो आदर्शों के जरिए शासित हैं। उनका राजनीति आदर्श संविधान के प्रस्ताव में निहित स्वतंत्र, समान और भाईचारे की जिंदगी है। उनके धर्म में निहित सामाजिक आदर्श उन्हें यह नहीं दे पाता।" - डॉ. भीमराव अंबेडकर
 जाति आधारित आरक्षण
अ.  आरक्षण अंग्रेजी शासन के दौरान भी 1932 में दिया गया था। उस समय पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लिए निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित किए गए थे। लेकिन इससे कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि पिछड़ों के लिए आरक्षित सीटों के लिए सिर्फ पिछड़ों को ही वोट देने का अधिकार दिया गया था। आजादी के बाद यह महसूस किया गया कि जातिगत ढांचा तब ही टूटेगा जब ऊंची जाति के लोग पिछड़ों के लिए मतदान करें या ऊंची जाति के लोग सरकारी संस्थाओं में पिछड़ों के अधीन काम करें। इसलिए सरकार ने विधायिका, सरकारी नौकरियों और सरकारी शिक्षण संस्थाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सीटें आरक्षित कीं।
ब. अति पिछड़ा वर्ग को आरक्षण - यह महसूस किया गया कि अनुसूचित जाति में नहीं आने वाली पिछड़ी जातियां विकास में पिछड़ रही हैं। इसे समझते हुए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने शैक्षणिक संस्थाओं में अति पिछड़ा वर्ग के छात्रों के लिए 27 फीसदी सीटें आरक्षित करने का फैसला किया।
स.    2012 में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सरकारी कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण देने का महत्वपूर्ण फैसला किय

महिला आरक्षण

राष्ट्रमंडल व्याख्यान, 2011 (लंदन) में ‘वूमेन एज़ एजेंट्स ऑफ चेंज’ विषय पर श्रीमती सोनिया गांधी द्वारा दिया गया भाषण 17 मार्च, 2011, लंदन, ब्रिटेन

 1.    परिचयात्मक कथ्य
प्रधानमंत्री, राष्ट्रमंडल अध्यक्ष, महासचिव और सम्मानीय अतिथिगण, चौदहवें राष्ट्रमंडल व्याख्यान में ‘वूमेन एज़ एजेंट्स ऑफ चेंज’ (महिलाएं: बदलाव की प्रणेता) विषय पर बोलते हुए मुझे गर्व महसूस हो रहा है। यहां अपनी बात रखने के अनुरोध को मैं दो वजहों से नकार नहीं सकती थी - पहला, महिला सशक्तिकरण को लेकर, खासकर भारत की महिलाओं में, जो राष्ट्रमंडल देशों की कुल महिला आबादी का 60 प्रतिशत हिस्सा हैं, मेरी व्यक्तिगत रुचि, और दूसरा इस संगठन से हमारे परिवार के घनिष्ठ संबंध।  
  
2. भारत और राष्ट्रमंडल
आधुनिक राष्ट्रमंडल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु का सबसे ज्यादा एहसानमंद है। वाकई यह विडंबना है कि जिस शख्स को औपनिवेशिक साम्राज्यों ने वर्षों तक जेल में रखा, वह राष्ट्रमंडल के अस्तित्व और विकास के लिए इतना महत्वपूर्ण बन गया।
भारत के लंबे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, इसकी सदस्यता का व्यापक विरोध हुआ, क्योंकि उसमें महारानी के आधिपत्य का स्वीकारना और उसमें निष्ठा जताना अंतर्निहित था। लेकिन विभाजन के बाद और वैश्विक ध्रुवीकरण के बीच विश्व इतिहास के छात्र नेहरु ने महसूस किया कि यह संस्था दम तोड़ती राजशाही और औपनिवेशिक शासन के खात्मे के बाद उभरती नई दुनिया के बीच पुल का काम कर सकती है। देश और लोगों के बीच कई स्तरों पर संबंध बनाने का काम राष्ट्रमंडल ही कर सकता है, इस योग्यता की पहचान नेहरु ने ही की थी।

अपने पिता की तरह इंदिरा गांधी का रुख बेशक राष्ट्रमंडल के प्रति उतना आदर्शवादी नहीं था, लेकिन उन्होंने राष्ट्रमंडल की प्रमुख हस्तियों के साथ न सिर्फ व्यक्तिगत संबंध बनाए, बल्कि सदस्य देशों के विकास पर विशेष तौर पर ध्यान केंद्रित करने में राष्ट्रमंडल की प्रमुखता से मदद की।
राष्ट्रमंडल देशों के शासनाध्यक्षों की बैठकों (चोगम) में अपने पति राजीव गांधी के साथ मैं भी शामिल रही हूं। मुझे आज भी इससे जुड़े कुछ बेहतरीन पल याद हैं, जिनमें से कुछ पर्दे के पीछे हुए। मसलन, 1985 में बहामास की चोगम में दक्षिण अफ्रीका पर प्रतिबंध लगाने को लेकर गंभीर चर्चा चल रही थी। रंगभेदी शासन पर प्रतिबंध लगाने की राष्ट्रमंडल की मांग का एकमात्र विरोध मार्गरेट थैचर ने किया। सप्ताहांत के रिट्रीट में सिद्धार्थ रामपाल तीन सदस्यीय टीम के साथ मिसेज थैचर से अनौपचारिक बातचीत करने और उन्हें मनाने पहुंचे। इन तीन सदस्यों में थे - राजीव गांधी, कनाडा के ब्रायन मुर्लोनी और ऑस्ट्रेलिया के रॉबर्ट हॉक। जाहिर तौर पर उनका चयन उनके राजनीतिक कद को लेकर किया गया था।

अकेले में सिद्धार्थ ने मजाक में कहा - 'सम्मेलन के तीन सर्वश्रेष्ठ सदस्यों का विरोध वह नहीं करेंगी।'

लेकिन वह लौह महिला अपने रुख पर कायम रहीं और वे तीन सर्वश्रेष्ठ उन्हें मनाने और राज़ी करने में विफल रहे। राष्ट्रमंडल के इतिहास में वह दौर राजनीतिक के टकराव का चरम दौर था। इसी तरह, 1987 के वैंकूवर चोगम में राजीव गांधी ने कॉमनवेल्थ ऑफ लर्निंग की स्थापना में भारत की मदद का वचन दिया। निश्चित तौर पर, इसने हमारे देश में दूरस्थ शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रमंडल द्वारा शुरु किए जाने वाले कार्यक्रमों में सहयोग करने को लेकर भारत हमेशा से अग्रणी रहा है और मुझे भरोसा है कि यह आगे भी जारी रहेगा।

मैं व्यक्तिगत तौर पर इस व्याख्यान के विषय को लेकर गर्व महसूस करती हूं। महिलाओं के अस्तित्व को आज भी निशाना बनाया जाता है। हाल के वर्षों की वैश्विक आर्थिक मंदी ने उन्हें सर्वाधिक नुकसान पहुंचाया है। इसी तरह, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक असंतुलन की सबसे ज्यादा कीमत महिलाओं ने चुकाई है। संघर्ष और युद्ध ने भी उनकी राह में रुकावटें पैदा की हैं। यह अनवरत जारी है कि कई देशों में लड़कियां बमुश्किल ही स्कूल जा पाती हैं, उनके स्वास्थ्य पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता, उन्हें सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती और उन्हें अपने जीवन के फैसले खुद लेने की अनुमति नहीं होती।
हम यह जानते हैं कि महिलाओं की उन्नति पर किया गया निवेश सबसे ज्यादा लाभ का सौदा है। यह सिर्फ उनके आसपास के सुधार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस सुधार का दायरा महिलाओं द्वारा स्वयं अपना, अपने परिवार, समुदाय और दुनिया में किए जाने वाले बदलाव तक है। यहां तक कि महिलाओं की उन्नति को लेकर किया जाने वाला छोटा निवेश भी बड़े पैमाने पर आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की प्रतिध्वनि होता है।

आधुनिक भारत के मंदिर

पंडित जवाहर लाल नेहरु, भाखड़ा नांगल परियोजना पर 8 जुलाई, 1954 को
आजकल मैं कई ऐसे कार्यक्रमों में जा रहा हूं जब या तो किसी परियोजना का उद्घाटन हो रहा होता है या कोई परियोजना पूरी हो रही होती है। आज आप और मैं और साथ में यहां उपस्थित सभी लोग ऐसे ही एक अवसर पर जमा हुए हैं। मैं यह जानना चाहता हूं कि इस अवसर पर आप क्या सोचते हैं। क्योंकि मैं तो बेहद उत्साहित हूं और कई तरह की तस्वीरें मेरे दिमाग में आ रही हैं। कई सपने जो हमने देखे थे वे आज पूरे हो रहे हैं। सपना पूरा होने के लिए हमें एक दूसरे को बधाई देना चाहिए और उन लोगों को भी बधाई देना चाहिए जिन्होंने अच्छा काम किया है। लेकिन कितनों की तारीफ की जा सकती है जब सूची हजारों, नहीं, लाखों की है?

आइए हम सब उसकी तारीफ करते हैं जो इसका हकदार है। जो काम हम आज देख रहे हैं और जिसके उद्घाटन के लिए हम सब जमा हुए हैं, वह हम लोगों में से किसी से भी बहुत बड़ा है। यह अद्भुत है। मैंने आपको पहले ही बताया कि मुझे या निःस्संदेह यहां मौजूद लोगों में से कई लोगों को कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेना होता है। कहीं कोई आधारशिला रखी जाती है या कहीं किसी भवन, अस्पताल, स्कूल या विश्वविद्यालय का उद्घाटन हो रहा होता है। बड़े कारखाने खुल रहे हैं। ऐसी गतिविधियां पूरे देश में चल रही हैं क्योंकि भारत माता कई तरह की चीजों को जन्म दे रही हैं। इनमें भाखड़ा नांगल का विशेष स्थान है। यहां पहले एक छोटा सा गांव था लेकिन आज यह नाम देश के हर हिस्से और दुनिया के भी कुछ हिस्सों में महान कार्य के लिए लिया जा रहा है। यह महान उद्यमिता का प्रतीक है।

तकरीबन 50 साल पहले एक अंग्रेज आए थे और अनुमान लगाया था कि यहां कोई महान कार्य किया जा सकता है। लेकिन उनका विचार आकार नहीं ले पाया। यह मामला कई बार उठा। कुछ योजनाएं भी बनीं लेकिन उन्हें लागू नहीं किया जा सका। इसके बाद देश आजाद हो गया। इस प्रक्रिया में पंजाब को काफी दुख-दर्द झेलना पड़ा। लेकिन इन जख्मों के बावजूद आजादी एक नए तरह का उत्साह लेकर आया। इसलिए जख्मों और दुःखों के बावजूद भी हम में यह महान कार्य करने का हौसला आया और हमने यह किया। मैं यहां कई बार आया हूं। आपमें से भी कई लोग यहां आए होंगे और यहां की बदलती तस्वीर देखकर आपके मन में भी हलचल पैदा हुई होगी। कितना अद्भुत और जादुई काम हुआ है। ऐसा काम जिसे वही देश कर सकता है जिसे खुद पर भरोसा हो और जो मजबूत हो। यह एक ऐसा काम है जो सिर्फ पंजाब, पेप्सू और पड़ोसी राज्यों का नहीं बल्कि पूरे देश का है।

भारत और भी कई ऐसे बड़े काम कर रहा है जिन्हें इससे छोटा नहीं कहा जा सकता। दामोदर घाटी परियोजना, हीराकुंड और दक्षिण भारत की परियोजनाओं पर काम चल रहा है। हर रोज योजनाएं बन रही हैं क्योंकि हम जितनी तेजी से हो सके उतनी तेजी से नए भारत का निर्माण करना चाहते हैं। ताकि यह मजबूत हो सके और जनता की गरीबी दूर हो सके। भाखड़ा नांगल इस दिशा में एक ठोस कदम साबित होने जा रहा है। भाखड़ा नांगल मील का पत्थर साबित होने वाला इसलिए नहीं कि इससे पंजाब, पेप्सू, राजस्थान में सिंचाई की सुविधा विकसित होगी और इससे उद्योगों को बढ़ावा मिलने से रोजगार के अवसर पैदा होंगे। यह खास इसलिए है क्योंकि यह एक ऐसे देश की इच्छाशक्ति का प्रतीक है जो ताकत, प्रतिबद्धता और साहस के साथ आगे बढ़ना चाहता है। इसलिए इसे देखकर मेरे साहस और शक्ति में बढ़ोतरी हो गई है। क्योंकि इससे अधिक उत्साहवर्धक कुछ नहीं होता कि आप अपने सपनों को पूरा होते देखें।

नांगल आने से पहले मैं भाखड़ा में था जहां बांध बना है। मैं सतलज के किनारे पर खड़ा हुआ और मैंने दाहिनी और बायीं ओर पहाड़ों को देखा। दूर-दूर कई जगहों पर लोग काम कर रहे थे। आज छुट्टी का दिन है इसलिए काफी लोग काम नहीं कर रहे थे। कई लोगों को यहां आना था। इसके बावजूद कुछ लोग काम कर रहे थे। शक्तिशाली पहाड़ों की तुलना में वे काफी छोटे दिख रहे थे। वे इन पहाड़ों में सुरंग बना रहे थे। मेरे मन में विचार आया कि ये वही लोग हैं जिन्होंने पहाड़ों से लोहा लिया और उन्हें अपने नियंत्रण में किया।

अभी जो पूरा हुआ है वह आधा काम ही है। हम भले ही इतने पर ही खुशियां मनाएं लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि अभी सबसे मुश्किल काम बचा हुआ है। वह है बांध का बनना। जिसके बारे में आप लोगों ने बहुत सुन रखा है। हमारे इंजीनियरों ने यह बताया कि दुनिया में संभवतः कहीं भी इतना ऊंचा बांध नहीं है जितना ऊंचा बांध हम बनाने जा रहे हैं। यह काम मुश्किल और पेचीदा है। जब मैं निर्माण स्थल पर घूम रहा था तो मेरे दिमाग में आया कि आज के समय में बड़े मंदिर, मस्जिद या गुरूद्वारे वे हैं जहां लोग मानवता की भलाई के लिए काम करते हों। इस भाखड़ा नांगल से बड़ी जगह क्या होगी, जहां हजा

श्वेत क्रांति

बिपिन चंद्रा, मृदुला मुखर्जी और आदित्य मुखर्जी द्वारा लिखित ‘इंडिया सिंस इंडिपेंडेंस’ नामक किताब से लिया गया उद्धरण-
‘भारत में सहकारी आंदोलन की दास्तां सहयोग के उस सबसे बड़े प्रयोग को शामिल किए बिना पूरी नहीं हो सकती, जो अपने तरह का अनूठा प्रयास था। यह पहल, जिसकी शुरुआत गुजरात के खेड़ा जिले में की गई, बाद में ‘श्वेत क्रांति’ का अग्रदूत बनी और पूरे भारत में फैल गई।’

‘गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी त्रिभुवन दास के. पटेल, जिन्होंने पैदल ही गांवों का दौरा कर किसानों को सहकारी दुग्ध समिति बनाने को प्रेरित किया था, जनवरी, 1947 में खेड़ा जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ के पहले अध्यक्ष हुए और अगले 25 वर्षों तक इस पद पर बने रहे। केरल के प्रतिभाशाली इंजीनियर और बाद में भारत में ‘श्वेत क्रांति’ के जनक माने जाने वाले डॉ. वर्गिज कुरियन 1950 से लेकर 1973 तक इसी संघ के कार्यकारी अधिकारी थे। यह संघ दो सहकारी समितियों के सहयोग से बना था, जिसमें हर समिति में 100 से भी कम सदस्य थे। लेकिन वर्ष 2000 तक ही कुल 5 लाख 74 हजार सदस्यों के साथ इसकी सहयोगी समितियों की संख्या 1015 हो गई। शुरुआत में जहां यह प्रतिदिन 250 लीटर दूध बेचती थी, वर्ष 2000 तक यह 10 लाख लीटर दूध रोज़ाना बेचने लगी और इसका सालाना कारोबार 487 करोड़ से बढ़कर 4 अरब 87 करोड़ रुपये हो गया।’

‘विकास की प्रक्रिया को तेज करते हुए संघ ने अपनी गतिविधियों को कई आयाम दिए। वर्ष 1955 में इसने दुध पाउडर और मक्खन का निर्माण करने के लिए एक कारखाने की स्थापना की, ताकि सर्दियों में उत्पादन की अधिकता के मुकाबले बाजार में दूध की कमी की समस्या से निपटा जा सके। उस वर्ष संघ ने अपना नाम बदलकर ‘अमूल’ रख लिया।’

‘किसी भी सामुदायिक विकास कार्य के लिए एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। खेड़ा सहकारी संघ एक बेहतर उदाहरण था कि किस प्रकार से कोई संघ अपनी गतिविधियों का विस्तार करता है और अपने उद्देश्यों को व्यापक बनाते हुए उसमें आम किसानों के हितों का ध्यान रखकर कई अन्य संगठनों की बुनियाद रख सकता है। ग्रामीण सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से कृत्रिम गर्भाधान सेवा की शुरुआत की गई, ताकि उत्पादक दूध की गुणवत्ता बढ़ा सकें। वर्ष 1994-95 में, 827 केंद्रों पर करीब 6,70,000 कृत्रिम गर्भाधान किए गए। इतना ही नहीं, रेडियो टेलीफोन से सजे 29 वाहनों पर मोबाइल पशु चिकित्सालय की सुविधा भी शुरु की गई, जहां नाममात्र की फीस पर जानवरों का इलाज किया जाता था। सहकारी सदस्यों के लिए पशु बीमा की शुरुआत भी हुई, और हरे चारे की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बेहतर गुणवत्ता वाले चारा बीज किसानों को उपलब्ध कराए गए। वहीं दूसरी तरफ, ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के बेहतर संचालन के लिए अमूल कॉम्पलैक्स और खेड़ा सहकारी का उपयोग प्रयोगशाला के रुप में करते हुए आणंद में ग्रामीण प्रबंधन संस्थान (आईआरएमए) की स्थापना की गई। इसमें पेशेवर प्रबंधकों को प्रशिक्षण देने का काम शुरु हुआ। राज्य के अन्य जिलों में ‘आणंद’ के विस्तार को देखते हुए 1974 में आणंद में गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड (गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ) की स्थापना की गई, जो विपणन (बाजार) के काम को देखने के लिए दुग्ध समितियों का एक शीर्ष संगठन था।’

‘को-ऑपरेटिव के गठन से खेड़ा जिले के ग्रामीणों, खासकर गरीब किसानों और भूमिहीनों के रहन-सहन और जीवन स्तर में व्यापक सुधार हुआ। एक अनुमान के मुताबिक, इस सहकारी संघ की वजह से खेड़ा जिले के ग्रामीण अपनी कुल आय का 48 प्रतिशत हिस्सा दूध से कमाने लगे। को-ऑपरेटिव ने अपने लाभ का कुछ हिस्सा ग्रामीणों की आम सुविधाओं पर भी खर्च किया और कुएं खुदवाने से लेकर सड़क और स्कूल आदि का निर्माण भी करवाया।’

‘खेड़ा सहकारी संघ की सफलता ने पूरे देश में इस आंदोलन के विस्तार को अपरिहार्य बना दिया। वर्ष 1964 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश के सभी मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखकर आणंद के तर्ज पर प्रस्तावित सहकारी दुग्ध समितियां बनाने संबंधी बृहद कार्यक्रम बनाने की बात कही। इस योजना को पूरा करने के लिए वर्ष 1965 में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड का गठन किया गया। कुरियन, जिन्होंने अपनी विविध प्रतिभा का परिचय दिया था, इस बोर्ड के मानद अध्यक्ष बनाए गए। उन्हीं के प्रयास से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की स्थापना एक अक्षुण्ण सरकारी विभाग के तौर पर नहीं, बल्कि अपने उद्देश्यों को समर्पित एक विभाग के तौर पर आणंद में की गई, न कि नयी दिल्ली में। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने पूरे देश में ‘ऑपरेशन फ्लड’ की शुरुआत की, जो आणंद की शैली पर ही आधारित था।’
‘ऑपरेशन फ्लड पर किए गए विश्व बैंक का एक अध्ययन बताता

20 सूत्री कार्यक्रम और गरीबी हटाओ

- “भारत गरीबी से जूझ रहा है और यह जरुरी है कि गरीबी मिटाने और बदलाव के लिए उपयुक्त माहौल तैयार करने के लिए हम अपने विकास कार्यक्रमों को तेजी से लागू करें। कई ऐसी समस्याएं हैं जिनका हमें समाधान करना पड़ेगा। हम उनके समाधान के लिए इंतजार नहीं कर सकते। हमें खुद अपना भविष्य गढ़ना होगा। हम चाहते हैं कि हर भारतीय का अपना भाग्य तय करने में योगदान हो। यह सच है कि हम आज़ाद हैं लेकिन हमें इसी आजादी को उन लाखों लोगों के लिए सच करना होगा जो अब भी मुश्किल में हैं। हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जिसमें हर किसी को पूरी आर्थिक, सामाजिक और राजनीति आज़ादी मिले।” श्रीमति इंदिरा गांधी

गरीबी हटाओ: एक क्रांतिकारी संदेश
1. आजाद भारत में कोई भी नारा इतना नहीं गूंजा जितना श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा दिया गया ‘गरीबी हटाओ’। इन दो सामान्य शब्दों ने क्रांतिकारी संदेश दिया- गरीबी को पूरी तरह से मिटाने का। एक ऐसे समय में जब करोड़ों लोग बेहद मुश्किल में हों, ऐसा नारा देना क्रांति से कम नहीं था।
2. इस नारे ने देश के राजनीतिक विमर्श को बदल दिया। पश्चिम के औद्योगिक राष्ट्रों की तरह यहां गरीबी को बदकिस्मती नहीं, न ही यहां गरीबी को वर्ग संघर्ष के पहले का चरण माना गया बल्कि आर्थिक प्रगति का दुष्परिणाम माना गया। कम्युनिस्ट देशों में ऐसा माना जाता था।
3. इंदिरा जी के मुताबिक यह शर्म का विषय था कि हमारे करोड़ों देशवासी अब भी गरीबी में असहाय जीवन जीने को मजबूर हैं।

1971 के चुनाव

1. इंदिरा जी ने 1971 का चुनाव ‘गरीबी हटाओ’ के मुद्दे पर लड़ा। उनकी बड़ी जीत यह साबित करती है कि उनके नारों को अपार जनसमर्थन मिला। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 518 में से 352 सीटें मिलीं। यह 1967 की सीटों के मुकाबले 73 अधिक थी। विपक्ष इस चुनाव में बुरी तरह पिट गई थी। कांग्रेस के बाद दूसरे नंबर पर 51 सीटों वाली पार्टी थी।
2. इंदिरा गांधी की राजनीतिक प्राथमिकता उनके विपक्षियों की प्राथमिकता ‘इंदिरा हटाओ’ से बिल्कुल अलग थी। इंदिरा हटाओ से लोगों में एक नकारात्मक संदेश गया और लोगों को लगा कि यह एक व्यक्ति के खिलाफ दुर्भावना से प्रेरित है। वहीं इंदिरा जी का नारा ऐसा था, जो राष्ट्र निर्माण को ध्यान में रखकर दिया गया था और जिसमें गरीबी के खिलाफ युद्ध छेड़ने की बात कही गई थी।

बीस सूत्री कार्यक्रम
"
1. गरीबों की हालत सुधारने के लिए प्रतिबद्ध इंदिरा जी ने मशहूर 20 सूत्री कार्यक्रम 1975 में लागू किया।
2. इसमें शामिल मुद्दे थे - 1. ग्रामीण गरीबी पर हमला 2. वर्षा आधारित कृषि के लिए रणनीति 3. सिंचाई जल का बेहतर इस्तेमाल 4. अधिक उपज 5. भूमि सुधार 6. ग्रामीण मजदूरों के लिए विशेष कार्यक्रम 7. स्वच्छ पेयजल 8. सबके लिए स्वास्थ्य 9. दो बच्चों का नियम 10. शिक्षा का विस्तार 11. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए न्याय 12. महिलाओं के लिए समानता 13. महिलाओं के लिए नए अवसर 14. लोगों के लिए आवास 15. झुग्गियों की हालत में सुधार 16. वनों के लिए नई रणनीति 17. पर्यावरण संरक्षण 18. ग्राहकों की चिंता 19. गांवों के लिए बिजली 20. जिम्मेदार प्रशासन।
3. असर - इस कार्यक्रम का व्यापक असर हुआ। इससे कृषि उत्पादन बढ़ा। विनिर्माण क्षेत्र में सुधार हुआ। भारत का निर्यात और विदेशी मुद्रा भंडार भी इस दौरान बढ़ा।

भूमि सुधार
1. ज़मींदारी उन्मूलन कानून, 1951 समेत और भी कई कानूनों ने सरकार और किसानों के बीच की ज़मींदारी को खत्म किया।
2. 1972 में इंदिरा जी ने सभी मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलाई। इसमें केंद्र ने जमीन रखने की ऊपरी सीमा तय की थी। इसमें सबसे अच्छी भूमि पर 1-10 एकड़, दूसरे दर्जे की भूमि पर 18-27 एकड़ और बाकी तरह की भूमि पर 27-54 एकड़ की अधिकतम सीमा तय की गई। पहाड़ी और रेगिस्तानी इलाकों के लिए यह सीमा थोड़ी अधिक थी।
3. कांग्रेस शासित प्रदेशों ने इंदिरा जी के दिशानिर्देशों का पालन करने में काफी दिलचस्पी ली। कर्नाटक में श्री देवराज उर्स और आंध्र प्रदेश में श्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में इस दिशा में काफी अच्छा काम हुआ।
4. सातवीं योजना अवधि यानी 1985 से 1990 के बीच देश के विभिन्न राज्यों में 44 लाख एकड़ जमीन वितरित की गई।
5. जमीन पर किसानों को पूरा अधिकार देने से किसान अधिक मेहनत और अधिक संसाधन लगाने को प्रेरित हुए और इससे कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी हुई।

यूपीए ने इंदिरा जी के एजेंडे को आगे बढ़ाया
1. अब भी इंदिरा जी की नीतियां कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार को राह दिखा रही हैं। 2006 में यूपीए सरकार ने संशोधित 20 सूत्री कार्यक्रम लागू किया।

आर्थिक विकास

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा 31 जुलाई, 2013 को वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के सम्मान में लिखी गई पुस्तक के लोकार्पण के अवसर पर दिए गए भाषण के खास अंश :
पिछले दशक के दौरान जब देश की अर्थव्यवस्था में 1991 में शुरु किए गये सुधारों के सभी लाभ स्वीकार कर लिए, अर्थव्यवस्था लगभग 7.5 प्रतिशत की दर से बढ़ी। हमारी विकास दर 2012-13 में धीमी होकर 5 प्रतिशत पर पहुंच गई। लेकिन हमें इस बात को लेकर निराश होने की जरुरत नहीं है और यह भी सोचने की जरुरत नहीं है कि हम फिर से पुराने ढर्रे पर आ गये हैं। पिछले कुछ वर्ष भारत के लिए ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए चुनौतीपूर्ण रहे हैं। हमें इसे अल्पावधि का और धीमी गति वाला संक्रमण काल समझना चाहिए। हमारी सरकार ने एक बार फिर गति में तेजी लाने का फैसला किया है। एक बार फिर हम उन लोगों को गलत साबित करेंगे जो हमेशा नकारात्मक बातें करते हैं और निराशाजनक परिणामों की चर्चा करते हैं।

भारत को तेज विकास के रास्ते पर लाने की नीतिगत रुपरेखा 12वीं पंचवर्षीय योजना में दी गई है। इसके अनेक महत्वापूर्ण अंशों पर इस पुस्तक के अनेक लेखों में व्याापक चर्चा की गई है। हमें उन अर्थशास्त्र संबंधी असंतुलनों से निपटना है, जो रास्ते में आड़े आ गये हैं। इनमें से प्रमुख चुनौतियां हमें ऊर्जा, जल और जमीन वाले खंडों में मिलेंगी।

आज जो बड़ी परियोजनाएं रुकी हुई हैं, उनमें मूल सुविधा एक बड़ी बाधा है। मंत्रिमंडल की निवेश संबंधी समिति जिसे हमने स्थापित किया है, वह नौकरशाही विलंब के खिलाफ एक तंत्र प्रदान करती है। शहरीकरण एक नई चुनौती है जिस पर हमें ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है।
हमारी रणनीति का उद्देश्य तेज विकास नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि विकास प्रकिया ज्यादा समावेशी हो। अनेक ऐसी नीतियां हैं जो यह उद्देश्य पूरा कर सकती हैं। यह हमें उन वंचित वर्गों की जरुरतें पूरी करने के लिए विशेष कार्यक्रम शुरु करने की भी जरुरत बताता है। इन वर्गों में खासतौर से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग और अल्पुसंख्यक शामिल हैं। हमने अनेक कार्यक्रम शुरु किए हैं। अब इनका विस्ताार करने और इन्हें अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने की जरुरत है।
पिछले पांच वर्षों की महत्वहपूर्ण उपलब्धि वह विकास रहा है जो ज्यादा समावेशी था। कृषि विकास तेज हुआ है और यह दसवीं योजना के 2.4 चार प्रतिशत की जगह 11वीं योजना के दौरान 3.6 प्रतिशत हो गया है। गरीबी का तेजी से उन्मूलन हो रहा है। भले ही हमारे व्यावसायिकजनों में इस मुद्दे पर विवाद रहे हों। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति आधार पर खपत 2004-05 की तुलना में पहले के मुकाबले बढ़ गई है। पहले के बीमारु कहे जाने वाले राज्य काफी अच्छा काम कर रहे हैं। ऊपर कही गई बातों से सुझाव मिलता है कि देश में त्वरित और समावेशी विकास के सभी घटक मौजूद हैं।
हमें यह जानकर बहुत खुशी होती है कि हमारे मंत्रिमंडल के साथी भी निवेश की गति बढ़ाने, रोजगार के नये अवसर पैदा करने, प्रतियोगिता की ताकतों को बल प्रदान करने और सबसे बड़ी बात तो यह कि सामाजिक विकास की प्रक्रिया को अधिक समावेशी बनाने की कोशिशें कर रहे हैं।
भारत के लोग इसकी उम्मीद करते हैं। दुनिया भी इसकी की उम्मीद करती है और इसका इंतजार कर रही है। हम आपको भरोसा दिलाते हैं हम उन्हें निराश नहीं करेंगे।

महात्मा गांधी नरेगा

सबको काम का अधिकार
  • भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। हालांकि अभी भी इसकी एक तिहाई आबादी गरीब हैं।
  • यूपीए ने 2004 में जब सत्ता संभाली तब इसके सामने एक अहम सवाल था। क्या भारत का विकास इंजन लाखों लोगों को गरीबी से बाहर निकाल सकता है?
  • कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को यकीन था कि आम आदमी तक बढ़ती अर्थव्यवस्था का लाभ हम तभी पहुंचा सकते हैं जब हम अपनी विकास नीतियों को समावेशी बनाएंगे। हमने माना कि समावेशी आर्थिक नीति ही लंबे समय तक टिकाऊ विकास को सुनिश्चित कर सकती है।
महात्मा गांधी नरेगा एक जवाब
  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) हमारी समस्याओं का हल है
  •  यह विश्व की सबसे बड़ी रोजगार योजनाओं में से एक है जिसने लाखों भारतीयों को विश्वास दिया है कि बेहतर भविष्य उनका इंतजार कर रहा है।
  •  इसने ग्रामीण भारत को संसद के अधिनियम के तहत रोजगार का कानूनी अधिकार दिया है। यह राष्ट्र द्वारा चुना गया बदलाव का रास्ता है जो गरीबी और रोजगार की समस्याओं को सुलझाता है।
  •  आज मनरेगा का अध्ययन आईएलओ और संयुक्त राष्ट्र सहित कई देश कर रहे हैं। विश्व में इसे एक आदर्श के रुप में देखा जा रहा है और कई देश इसका अनुकरण करना चाहते हैं।
     भारत की आबादी के हर पांचवें हिस्से के पास काम की गारंटी है
  •  सरकार ने दो लाख करोड़ रुपए मनरेगा पर खर्च किए हैं। जिससे सुनिश्चित तौर पर लोग अब गरीबी से निजात पा रहे हैं और उन्हें गरीबी से उबरने के संसाधन प्राप्त हो रहे हैं।
  •  2012-13 में 136.18 करोड़ कार्य दिवस 4.08 करोड़ परिवारों को प्रदान किए गये हैं। जिसमें 22 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 16 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और 53 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। 

खाद्य सुरक्षा कानून

खाद्य सुरक्षा पर कानून की जरुरत क्यों है?
  • अभी भारत सरकार कई ऐसे कार्यक्रम चला रही है जिसके तहत गरीबों के बीच अनाज वितरण किया जा रहा है और पोषकता को बढ़ावा दिया जा रहा है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अध्यादेश इन सबको एक में समाहित करता है। इसमें एक और ख़ासियत यह है कि इस योजना के तहत मिलने वाला लाभ वैधानिक अधिकार है और इसे अपने हिसाब से बदला नहीं जा सकता।
  •  इसका वायदा कांग्रेस ने 2009 के अपने चुनावी घोषणापत्र में किया था। कांग्रेस ने वादा किया था कि रोजगार गारंटी योजना की तर्ज पर खाद्य सुरक्षा कानून लाया जाएगा।
खाद्य सुरक्षा अध्यादेश क्या है और यह पहले से लागू इस तरह की योजनाओं से कैसे अलग है?
  • पहले से ऐसी जो योजनाएं लागू हैं उनके मुकाबले नए अध्यादेश से खाद्य सुरक्षा को कानूनी अधिकार बनाया गया है। इसके तहत लाभार्थियों को पर्याप्त मात्रा में और किफायती दर पर खाद्यान्न हासिल करने का कानूनी अधिकार है।
  • नए कानून में हर आयु वर्ग के लोगों की जरुरतों का ध्यान रखा गया है। इसमें लिंग आधारित विशेष प्रावधान भी किए गए हैं।
  • अगर किसी वजह से खाद्यान्न लोगों तक नहीं पहुंचता तो लाभार्थियों को खाद्यान्न भत्ता देने का प्रावधान किया गया है।
नए कानून के तहत आपके क्या अधिकार हैं?
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का लक्ष्य यह है कि कोई भी भूखा न रहे और सभी को पर्याप्त पोषण मिले। यह कानून हर आयु वर्ग के लोगों की जरुरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। विभिन्न आयु वर्ग के लोगों को निम्नलिखित हक दिए गए हैं:
  • छह महीने से तीन साल आयु के सभी बच्चे: इनके लिए स्थानीय आंगनवाड़ी से घर ले जाने के लिए पोषक राशन मिलेगा।
  • तीन से छह साल आयु वर्ग वाले सभी बच्चे: इन्हें भी स्थानीय आंगनवाड़ी से या तो घर ले जाने वाले राशन के रुप में या फिर बना-बनाया गर्म भोजन मिलेगा।
  • कक्षा 8 तक सरकारी स्कूल में जाने वाले सभी बच्चे: इन्हें स्कूल के दौरान हर रोज बना-बनाया पोषक मध्याह्न भोजन मिलेगा।
  • गर्भवती या स्तनपान कराने वाली सभी महिलाएं: इन्हें भी स्थानीय आंगनवाड़ी से या तो घर ले जाने वाले राशन के रुप में या फिर बना-बनाया गर्म भोजन मिलेगा।
  • प्राथमिकता वाले हर परिवार: हर महीने परिवार के हर व्यक्ति के लिए पांच किलो के हिसाब से 3 रुपये किलो चावल, 2 रुपये किलो गेहूं और 1 रुपये किलो मोटा अनाज सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिए मिलेगा। यह कीमत तीन साल के लिए है।
  • प्राथमिकता वाले परिवार: इस कानून के तहत इसका आशय उन परिवारों से है जो राज्य सरकार द्वारा परिभाषित पात्रता के दायरे में नहीं है। जैसे सरकारी नौकरी तो नहीं है आदि। देश की कम से कम दो तिहाई आबादी प्राथमिकता वाले परिवारों की श्रेणी में आएगी। ग्रामीण इलाकों के 75 फीसदी लोग और शहरी इलाके के 50 फीसदी लोग। गरीब राज्यों में यह प्रतिशत और भी अधिक होगा।
  •  इसके अतिरिक्त अंत्योदय परिवारों को हर महीने 35 किलो अनाज 3 रुपये की दर से चावल और 2 रुपये की दर से गेहूं मिलेगा।
  •  इस कानून के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली में व्यापक सुधार लाने का प्रावधान किया गया है ताकि योजना का लाभ अधिकतम लोगों तक पहुंच सके।
नए कानून के दायरे में आने वाले लाभार्थी कौन हैं?
  •  इस कानून के दायरे में 75 फीसदी ग्रामीण आबादी और 50 फीसदी शहरी आबादी आएगी। हालांकि, इस दायरे में आने वाले लोगों के बारे में तय करने का अधिकार राज्यों का होगा। अध्यादेश में यह साफ किया गया है कि उन्हें ऐसा छह महीने के अंदर करना होगा।
  •  राज्य सरकारों द्वारा लाभार्थियों की पहचान की जाएगी। इस कानून में दो श्रेणी बनाई गई हैं - अंत्योदय अन्न योजना और प्राथमिकता वाले परिवार।
  •  कुछ हक सबके लिए हैं। जैसे छह साल से कम उम्र के सभी बच्चों को एकीकृत बाल विकास योजना के तहत कवर किया गया है। वहीं स्कूल जाने वाले सभी बच्चों को मध्याह्न भोजन योजना के दायरे में लाया गया है।
  •  मां बनने वाली सभी महिलाओं को छह महीने तक योजना के तहत लाभ देने का प्रावधान है।
  •  नए कानून में गरीबी रेखा से ऊपर के लोगों को मिल रहा कोटा खत्म करने का प्रावधान है। अभी सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत इन्हें लाभ मिल रहा है। इसे इसलिए खत्म किया जा सके ताकि लाभार्थियों के चयन का दायरा व्यापक हो सके।
इस कानून के वित्तीय प्रभाव क्या होंगे?
  • कानून मौजूदा योजनाओं के

शिक्षा

‘मनुष्य न तो मात्र बुद्धि है और ना हीं सकल पशु शरीर है, न ही वह केवल दिल या आत्मा है। इन तीनों का उचित और सामंजस्यपूर्ण संयोजन एक संपूर्ण मनुष्य के निर्माण के लिए आवश्यक है और यही शिक्षा के असली अर्थशास्त्र का गठन करता है ....’’  महात्मा गांधी
शिक्षा का अधिकार
  • कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 1 अप्रैल, 2010 को शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) लागू किया गया। इस कानून को लागू कर कांग्रेस ने बच्चों की शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का प्रदर्शन किया। अब भारत में हर बच्चे के पास शिक्षा का कानूनी अधिकार है।
  • शिक्षा का अधिकार अधिनियम समाज के पिछड़े और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए प्रत्येक निजी विद्यालय में 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करता है। साथ ही यह कानून सभी गैर मान्यता प्राप्त विद्यालयों पर प्रतिबंध लगाता है। इसमें नामांकन के नाम पर लिए जाने वाले डोनेशन या कैपिटेशन राशि और बच्चे या माता पिता के साक्षात्कार पर भी रोक का प्रावधान किया गया है।
  • इस अधिनियम में यह भी कहा गया है कि किसी भी बच्चे को वापस उसी कक्षा में नहीं रखा जा सकता न ही उसे स्कूल से निष्कासित किया जा सकता है। कोई भी बच्चा प्राथमिक शिक्षा पूरी होने से पहले बोर्ड परीक्षा पास नहीं कर सकता है। साथ ही पढ़ाई छोड़ चुके छात्रों के लिए विशेष प्रशिक्षण का प्रावधान रखा गया है ताकि वे अपने उम्र के छात्रों के साथ बराबरी कर सके।
  • आरटीई अधिनियम सभी इलाकों में शिक्षा की आवश्यकता की निगरानी करने का प्रावधान करता है तथा शिक्षा के योग्य सभी बच्चों की पहचान करने के निर्देश देता है। इसमें शिक्षा प्रदान करने की हर सुविधा उपलब्ध करवाने की बात भी कही गई है। यह शायद दुनिया का पहला ऐसा कानून है जो सरकार पर बच्चों के नामांकन और स्कूलों में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी डालता है।
कांग्रेस पार्टी की शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता
  • केंद्र सरकार ने वर्ष 2012-13 में 23,836 करोड़ रुपए सर्व शिक्षा अभियान के लिए जारी करने की मंजूरी दी है। जो 2003-04 में जारी किए गए 2,730 करोड़ रुपए से 8.7 गुना अधिक है। यह राशि 2,441 प्राथमिक विद्यालय, 2,453 उच्च प्राथमिक विद्यालय, करीब दो लाख अतिरिक्त कक्षाएं और 2.7 लाख शौचालयों के निर्माण पर खर्च की जाएगी।
  • यूपीए सरकार ने मिड-डे-मील योजना के लिए परिव्यय को काफी बढ़ा दिया है। यूपीए सरकार द्वारा वर्ष 2011-12 में 9,890 करोड़ रुपए इस मद में जारी किए गए जो राजग सरकार द्वारा 2003-04 में आवंटित किए गए 1,325 करोड़ रुपए का 7.5 गुना है।
  • माध्यमिक विद्यालयों में बच्चों के सकल नामांकन का अनुपात तेजी से बढ़ा है। जीईआर 2003-04 में जहां 62.5 प्रतिशत था वहीं यह 2010-11 में बढ़कर 85.5 प्रतिशत हो गया है।
  • केंद्रीय विश्वविद्यालयों की संख्या भी बढ़ी है। 2004 में जहां देश में मात्र 14 केंद्रीय विश्वविद्यालय थे, वहीं 2013 तक इनकी संख्या 44 पर पहुंच चुकी है। यूपीए सरकार ने आईआईटी और आईआईएम की संख्या दोगुनी से भी अधिक कर दी है। नौ नए आईआईटी (पहले से मौजूद सात) और सात नए आईआईएम (पहले से मौजूद छह) के साथ पांच आईआईएसईआर और दो आईआईआईटी खोले गए हैं। 
 

आधार और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण

प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण
  • भारत हर साल सब्सिडी के तौर पर दो लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है। लेकिन इसका एक हिस्सा लाभार्थियों तक पहुंच नहीं पाता। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा क्योंकि आधार आधारित प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण योजना भारत में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली है। लोगों को अब सीधे अपने बैंक खाते में सब्सिडी मिलनी शुरु हो गई है।
  • आम आदमी के लिए तकनीक का इस्तेमाल करने को प्रतिबद्ध यूपीए सरकार ने महत्वाकांक्षी आधार परियोजना 2011 में शुरु की थी। इसका लक्ष्य था हर भारतीय को एक ऐसा पहचान पत्र देना जो बायोमेट्रिक सूचनाओं के आधार पर तैयार किया गया हो।
  • 28 करोड़ से अधिक भारतीयों का आधार कार्ड बन गया है। अगले 18 महीने में और 30 करोड़ लोग इस दायरे में आ जाएंगे। धीरे-धीरे देश के सभी लोगों के पास आधार कार्ड होगा।
  • आधार न सिर्फ उन लोगों के लिए पहचान पत्र है जिनके पास अब तक पहचान पत्र के नाम पर कुछ नहीं था बल्कि यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म बन गया है जिसके ज़रिए सरकरी योजनाओं में से भ्रष्टाचार, लीकेज और देरी को दूर किया जा सकता है। आधार एक ऐसा औजार है जिसके ज़रिए सरकार के विभिन्न कार्यक्रमों और योजनाओं की निगरानी भी हो सकेगी।
यूआईडीएआई पर प्रधानमंत्री की परिषद
02 जुलाई 2009 को यूपीए सरकार द्वारा श्री नंदन एम. नीलकेणी को कैबिनेट मंत्री के दर्जे एवं ओहदे के साथ यूआईडीएआई के अध्यक्ष के रुप में 5 वर्षों के लिये नियुक्त किया गया। यूआईडीएआई पर प्रधानमंत्री की परिषद की स्थापना 30 जुलाई 2009 को की गई थी।
मिशन
  • प्राधिकरण की योजना एक ऐसी विशिष्ट पहचान संख्या देने की है जिसकी पुष्टि कहीं से भी ऑनलाइन की जा सके, वह भी बगैर खास लागत के और जो फर्जी पहचान पत्र प्रस्तुत करने को रोक सके। पांच साल में प्राधिकरण की योजना 60 करोड़ आधार कार्ड बनाने की है।
  • प्राधिकरण को भारत के प्रत्येक निवासी को एक विशिष्ट पहचान और उसकी कहीं भी, कभी भी सत्यापन हेतु अंकीय आधार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी दी गई है। इसमें व्यक्ति से संबंधित बुनियादी जानकारियां अंकित होंगी। इस अंक को आधार का नाम दिया गया।
  • आधार एक ऐसी बुनियादी सुविधा के तौर पर काम करेगा जिसके बूते देश में वित्तीय समावेशन बढ़ेगा। बैंक इसे संबंधित व्यक्ति के बैंक खाते से जोड़ सकते हैं और फिर इसके जरिए संबंधित व्यक्ति देश में कहीं से भी बैंकिंग सेवाओं का लाभ ले सकता है।
  • आधार हर व्यक्ति के अधिकारों को सही ढंग से लागू कराने में भी मददगार साबित होगा। लोगों की रोजगार, शिक्षा और भोजन संबंधित अधिकारों के क्रियान्वयन के लिए यह जरुरी होगा कि लोग अपनी पहचान सरकार के पास दर्ज कराएं। इसके बाद जो आधार संख्या मिलेगी उसके जरिए सरकार के लिए इन अधिकारों को लोगों तक पहुंचाना सुनिश्चित हो सकेगा।
  • प्राधिकरण ने आधार कार्यक्रम 29 सितंबर, 2010 को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी द्वारा महाराष्ट्र के शाहदा के तेंभुली गांव में शुरु किया गया था। आधार संख्या पाने वाली पहली नागरिक बनीं तेंभुली गांव की रंजना सोनवाने।

खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई)

संकट को अवसर में बदलना- 1991
वर्ष 1991 में डॉ मनमोहन सिंह ने सुधारों की एक श्रृंखला के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर किया। नतीजतन दो दशकों के भीतर ही, तेजी से बढ़ती विकास दर और अपने आकार की वजह से भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया।
प्रत्यक्ष विदेश निवेश यूपीए की देन
21 सितंबर, 2012 को कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने खुदरा, बीमा और नागरिक उड्डयन क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देकर आर्थिक सुधारों के दूसरे चरण की शुरुआत की।
16 जुलाई, 2013 को सरकार ने दूरसंचार, रक्षा उत्पादन, परिसंपत्ति पुनर्निर्माण और खुदरा एकल ब्रांड सहित 13 क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर सुधारों की रफ्तार बढ़ाने का प्रयास किया।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अनुसार, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार द्वारा किए गए प्रयासों की वजह से 2003-04 में देश में महज 4.3 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रवाह हुआ, जबकि 2013-14 में यूपीए के प्रयासों की वजह से यह 36 अरब अमेरिकी डॉलर का आंकड़ा छूने वाला है।
खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
वर्ष 2006 में खुदरा एकल ब्रांड क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति दी गई थी। 21 सितंबर, 2012 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक बार फिर से साहसिक फैसला लिया और यूपीए सरकार ने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति दी। डॉ सिंह ने आर्थिक परिस्थिति की तुलना 1991 के आर्थिक संकट से की, जब ‘कोई भी हमें पैसा उधार देने को तैयार नहीं था, यहां तक कि थोड़ी मात्रा में भी नहीं’, और देश ने आर्थिक सुधारों की ओर कदम बढ़ा दिए। उन्होंने आगे कहा, ‘हालांकि भारत पर ऐसा संकट नहीं था, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था से उनका विश्वास खत्म हो, इससे पहले ही हमें कुछ करना था।’
किसानों को फायदा
कुल निवेश का कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा अंतःबुनियादी ढांचे पर खर्च होगा। अत्यधिक कुशलता और उन्नत प्रौद्योगिकी के कारण वितरण, परिवहन, विनिर्माण, गुणवत्ता, पैकेजिंग, भंडारण, रसद और कोल्ड स्टोरेज क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव होंगे।
कृषि उपज सीधे दुकानों तक पहुंचेगी, जिससे बर्बादी का खतरा कम से कम होगा।
किसानों को अपने उत्पादन का अधिक से अधिक मूल्य मिलेगा, क्योंकि इससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी।
किराना दुकानदारों को लाभ
खुदरा बिक्री को लेकर हुए कई अध्ययन यह कटु सच्चाई बताते हैं कि संगठित खुदरा विक्रेताओं के आने से अन्य खुदरा विक्रेताओं के रोजगार में कोई गिरावट नहीं आती। अलबत्ता, छोटे विक्रेता नए उत्पादों की ब्रांड लाकर, बेहतर साजो-सज्जा कर, दुकानों का नवीकरण कर, सेल्फ सर्विस की शुरुआत कर और साख देकर न सिर्फ अत्यधिक बिक्री कर सकते हैं, बल्कि अपना विकास भी कर सकते हैं।
इसके साथ ही, अगर किराना स्टोर और रेहड़ी, पटरी पर व्यवसाय करने वाले फ्रेंचाइजी के माध्यम से संगठित व्यवसाय का रास्ता चुनते हैं, तो वे भी खुदरा क्षेत्र में होने वाले आधुनिक बदलाव का हिस्सा बन सकते हैं।
उपभोक्ताओं के लिए फायदेमंद
हालांकि, सभी आय वर्ग के लोग संगठित खुदरा विक्रेताओं से खरीदारी करके लाभान्वित होते हैं, लेकिन यह देखा गया है कि कम आय वर्ग के लोग इससे ज्यादा लाभान्वित होते हैं और वे ज्यादा बचत करते हैं।
कम आय वाले उपभोक्ताओं के लिए संगठित खुदरा विक्रेताओं के यहां से खरीदारी इसलिए भी फायदेमंद है, क्योंकि यहां उन्हें कम कीमत पर बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद मिल जाते हैं।
आम नागरिकों के लिए फायदेमंद
खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति देने से नए रोजगार के अवसरों का भी सृजन होगा। चूंकि प्रत्यक्ष विदेश निवेश के माध्यम से खुलने वाली दुकानें अपने 30 प्रतिशत उत्पादों की खरीदारी लघु अथवा कुटीर उद्योग क्षेत्रों से करेंगी, इसलिए देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमियों के लिए रोजगार के नए अवसर बढ़ेंगे।
भारत के संघीय ढांचे को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति देने का फैसला संबंधित राज्य सरकारों पर छोड़ दिया है।
इसके अलावा, विदेशी खुदरा विक्रेता केवल उन्हीं शहरों में अपनी दुकान लगा पाएंगे, जहां की आबादी दस लाख से अधिक होगी।

ऊर्जा

ऊर्जा की ताकत
भारत के विकास की राह में आने वाली चौतरफा मुश्किलों का ऊर्जा क्षेत्र बखूबी सामना करता है, इसलिए कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का मुख्य ध्यान ऊर्जा क्षेत्र पर रहा है।
यूपीए की पहल
संस्थापित विद्युत क्षमता में लगभग 1 लाख मेगावाट की वृद्धि यूपीए सरकार ने की है, और उम्मीद है कि यूपीए-2 के कार्यकाल की समाप्ति तक यह क्षमता दोगुनी हो जाएगी। इसके अतिरिक्त केंद्र सरकार ने जितने अधिक गांवों को बिजली से जोड़ा है, वैसा भारत के इतिहास में अब तक नहीं देखा गया है।
पिछले नौ वर्षों में सरकार ने 11,00 मेगावाट प्रति साल की दर से अपनी विद्युत क्षमता बढ़ाई है। वर्ष 2004 में जब यूपीए को देश की कमान मिली, तो संस्थापित क्षमता महज 1.12 लाख मेगावाट थी, लेकिन अब यह करीब 99,077 मेगावाट बढ़कर 2.11 लाख मेगावाट पर पहुंच गई है। यानी राजग शासनकाल की तुलना में यूपीए के कार्यकाल में 88 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
राजग का कथित विकास
वर्ष 1998 में भारत की कुल संस्थापित क्षमता 89,167 मेगावाट थी, जो राजग के कार्यकाल की समाप्ति तक महज 23,522 मेगावाट बढ़कर 112,689 मेगावाट हुई। इतना ही नहीं, राजग ने अपने पांच साल के शासनकाल में उत्पादन क्षमता में जितनी वृद्धि की, यूपीए के नौ साल के शासनकाल के दौरान उसमें चार गुना अधिक वृद्धि हुई है।
नतीजतन, भारत आज दुनिया का छठा सबसे बड़ा ऊर्जा उत्पादक देश बन गया है और 31 जनवरी, 2013 तक हमारे पास कुल 2,11,766 मेगावाट संस्थापित क्षमता हो गई है। 
ग्रामीण विद्युतीकरण
मई, 2004 में जब यूपीए सरकार ने कार्यभार संभाला, तो 4.74 लाख गांवों को बिजली की सुविधा उपलब्ध थी, जबकि 1.2 लाख गांवों बिना बिजली के थे।
कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने ग्रामीण विद्युतीकरण की दिशा में काफी विकास किया। हमने करीब 1 लाख गांवों तक बिजली पहुंचाई और गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले 1.75 करोड़ परिवारों के जीवन स्तर को बेहतर बनाया। 30 अप्रैल, 2013 तक महज 33,060 गांव ही ऐसे बचे थे, जहां बिजली की सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाई, लेकिन हमारी कोशिश यही है कि हर भारतीय घर में बिजली की सुविधा जल्द से जल्द उपलब्ध हो।
असैन्य परमाणु ऊर्जा
इस समय भारत के पास कुल संस्थापित विद्युत क्षमता 2.11 लाख मेगावाट है, लेकिन इसका सिर्फ 2.5 प्रतिशत हिस्सा यानी 4780 मेगावाट का उत्पादन ही परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से हो रहा है। अब हमारी कोशिश वर्ष 2032 तक इसे बढ़ाकर 63,000 मेगावाट तक करने की है। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का स्पष्ट तौर पर मानना है कि भारत के भविष्य के लिए परमाणु ऊर्जा का असैन्य सुरक्षित इस्तेमाल काफी महत्वपूर्ण है।
वर्ष 2006-07 में हमारी परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता महज 18,634 मिलियन यूनिट थी, जो 2012-13 में बढ़कर 32,863 मिलियन यूनिट हो गई। भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड ने न सिर्फ तारापुर, राजस्थान, मद्रास, कैगा, नरोरा और काकरापार के संयंत्रों की उत्पादन क्षमता बढ़ाई है, बल्कि कुंडनकुलम, राजस्थान और काकरापार में नई परियोजनाओं पर काम शुरु भी कर दिया है। 

सड़क, रेल और हवाई परिवहन

भौतिक बुनियादी ढांचे के निर्माण को सर्वोच्च प्राथमिकता
आधारभूत संरचनाओं के विकास में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) को लागू करने के मामले में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है।
40,99,240 करोड़ रुपये (1025 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का अनुमानित निवेश।
कुल निवेश का 47 प्रतिशत हिस्सा निजी क्षेत्रों से निवेश होने की उम्मीद।
सड़क और राजमार्ग
33.4 लाख किलोमीटर सड़क के साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क वाला देश है।
वर्ष 1988 में श्री राजीव गांधी की सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की स्थापना की, और आज देश में राष्ट्रीय राजमार्ग की कुल लंबाई 79,243 किलोमीटर हो गई है।
स्वर्णिम चतुर्भुज योजना
भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने स्वर्णिम चतुर्भुज योजना की शुरुआत की और इसे 2004 के दिसंबर तक खत्म करने का लक्ष्य रखा, लेकिन अप्रैल, 2003 तक महज 23 फीसदी काम ही पूरा किया जा सका।
सितंबर, 2004 में योजना आयोग की दसवीं योजना मध्यावधि मूल्यांकन में यह बात सामने आई कि 5846 किलोमीटर की स्वर्णिम चतुर्भुज योजना का महज 37 प्रतिशत यानी 2198 सड़क निर्माण का काम ही पूरा हो पाया है। लिहाजा इस परियोजना को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की पहली सरकार ने ही पूरा किया।
यूपीए सरकार ने ही वर्ष 2009 में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना के दूसरे चरण को और फरवरी, 2013 में तीसरे चरण के 52 फीसदी हिस्से को पूरा किया।
ग्रामीण सड़क नेटवर्क
पिछले नौ वर्षों में दो लाख किलोमीटर नई सड़कें बनाकर ग्रामीण सड़क नेटवर्क का विस्तार किया गया है। (ग्राफ देखें)
वर्ष 2001-02 से लेकर 2003-04 (राजग शासनकाल) के दौरान प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना पर महज 9,682 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए थे, जबकि 2009-10 से लेकर 2012-13 की अवधि में यूपीए शासनकाल के दौरान इस योजना पर 56,251 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जो राजग शासनकाल की तुलना में 480 प्रतिशत ज्यादा है। (ग्राफ देखें)
असल में, सड़कों का निर्माण केंद्र सरकार का उस उग्र वामपंथ के खिलाफ लड़ने का प्रमुख हथियार रहा है, जिसका मध्य भारत के कई हिस्सों पर प्रभाव है। इन क्षेत्रों में 5487 किलोमीटर सड़क निर्माण का लक्ष्य रखा गया था, जिसमें 2579 किलोमीटर सड़क निर्माण दिसंबर, 2012 तक कर लिया गया था।
राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना के विभिन्न कामों के तहत बनने वाले 66,000 किलोमीटर सड़क में से 24,087 किलोमीटर सड़क निर्माण दिसंबर, 2012 तक कर लिया गया था।
रेलवे
पश्चिमी और पूर्वी डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर के निर्माण का कार्य तेजी से चल रहा है, जिसे मार्च, 2017 तक पूरा करने का लक्ष्य है।
वर्ष 2012-13 के लिए संशोधित माल लदान का लक्ष्य बढ़ाने के बाद भारतीय रेल एक अरब टन सेलेक्ट क्लब में शामिल हो गया है। इस क्लब के अन्य सदस्य मात्र चीन, रुस और अमेरिका हैं।
यात्री गाड़ियों की संख्या में भी काफी वृद्धि की गई है। वर्ष 2001-02 में जहां 8,897 गाड़ियां चलती थीं, वहीं 2011-12 में इसे बढ़ाकर 12,335 किया गया। प्रति लाख किलोमीटर पर होने वाली ट्रेन दुर्घटनाओं में भी कमी आई है और यह 2003-04 की 0.41 प्रतिशत की तुलना में घटकर 2011-12 में 0.13 हो गई है।
कश्मीर घाटी को काजीगुंड-बनिहाल रेल लिंक के माध्यम से जोड़ा गया है, जिसका उद्घाटन 26 जून, 2013 को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने किया।
अब अरुणाचल प्रदेश भी जल्दी ही रेल नेटवर्क से जुड़ जाएगा, क्योंकि यूपीए सरकार हरमुती-नाहरलागुन रेल लाइन परियोजना को हरी झंडी दिखाने का फैसला कर लिया है। मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, नगालैंड और असम में कई परियोजनाओं को मंजूरी देकर यूपीए सरकार ने पूर्वोत्तर को रेल नेटवर्क से जोड़ने को लेकर विशेष प्रयास किया है।
जल परिवहन - बंदरगाह और अंतर्देशीय जलमार्ग
387 परियोजनाओं वाला राष्ट्रीय समुद्री विकास कार्यक्रम पूरा हो चुका है।
ग्यारहवीं योजना में रखे गए कुल 11.03 मिलियन ग्रॉस टनेज (जीटी) के लक्ष्य के बनिस्बत भारतीय तिरंगे के तले 10 मिलियन ग्रॉस टनेज (जीटी) से अधिक का नौपरिवहन हो चुका है।
अब तक कुल पांच जलमार्गों को भारत का राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया है, जिसमें से दो राष्ट्रीय जलमार्गों की घोषणा यूपीए सरकार द्वारा ही 2008 में की गई थी।
वर्ष 2012 में प्रमुख बंदरगाहों की क्षमता 696.53 एमएमटीपीए से बढ़ाकर 748 एमएम

शहरी विकास

शहरी क्षेत्र में विकास की आवश्यकता
तेजी से बढ़ते शहरीकरण और शहरों की ओर होते भारी पलायन को देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने वर्ष 2005 में जवाहरलाल नेहरु शहरी नवीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) की शुरुआत की, ताकि लक्षित शहरों में नियोजित विकास की जा सके।
1 लाख करोड़ रुपये खर्च कर इस मिशन के तहत देश भर के 60 से अधिक शहरों को लाभ पहुंचाया गया है।
वर्ष 2021 तक देश की कुल आबादी में शहरी आबादी की हिस्सेदारी 40 फीसदी तक बढ़ सकती है। अनुमान यह भी है कि वर्ष 2011 से कुल सकल घरेलू उत्पाद में 65 प्रतिशत हिस्सेदारी शहरी क्षेत्र की होगी।
शहरी क्षेत्र में निवेश की आवश्यकता
ऐसा अनुमान है कि सात साल की अवधि में शहरी स्थानीय निकायों को 1,20,536 करोड़ निवेश की जरुरत होगी। इसमें बुनियादी ढांचे और सेवाओं पर होने वाला निवेश भी शामिल है। यानी इस मद में सालाना 17,219 करोड़ रुपये की जरुरत होगी।
यही वजह है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के अपने न्यूनतम साझा कार्यक्रम में भौतिक ढांचे के विकास और विस्तार को विशेष प्राथमिकता दी है।
जेएनएनयूआरएम का लक्ष्य सुधारों को प्रोत्साहित करना और लक्षित शहरों में द्रुत गति से नियोजित विकास को बढ़ावा देना है। इस योजना के तहत शहरी ढांचागत विकास और सेवा वितरण तंत्र को बेहतर बनाने, सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने और शहरी स्थानीय निकायों को नागरिकों के प्रति अत्यधिक जवाबदेह बनाने की कोशिशें हुई हैं।
30 जून, 2012 तक जेएनएनयूआरएम की शहरी ढांचागत विकास और प्रशासकीय योजना के तहत 62,253 करोड़ की लागत से 554 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा, यूआईडीएसएसएमटी के तहत, 14,021 करोड़ की लागत से 807 परियोजनाओं को मंजूर किया गया है।
जवाहरलाल नेहरु शहरी नवीकरण मिशन का उद्देश्य
  1. मिशन के तहत लक्षित शहरों में बुनियादी सेवाओं के एकीकृत विकास पर ध्यान केंद्रित करना।
  2. दीर्घकालीन परियोजनाओं की स्थिरता के लिए किए जा रहे सुधारों के द्वारा परिसंपत्ति निर्माण और उसके प्रबंधन के बीच संबंध स्थापित करना।
  3. शहरी ढांचागत सेवाओं में व्याप्त कमियों को दूर करने के लिए पर्याप्त धनराशि सुनिश्चित करना।
  4. शहरीकरण का दायरा बढ़ाने के लिए शहरों की चौहद्दी, उसके गलियारों आदि का नियोजित विकास करना।
  5. यह भी सुनिश्चित करना कि लक्षित शहरों में नागरिक सुविधाओ का विकास हो तथा उसका उपभोग शहरी गरीब भी करें।
  6. पुराने शहरों में जनसंख्या घनत्व कम करने लिए शहरी नवीकरण योजना पर विशेष ध्यान देना।
  7. शहरी गरीबों को बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराना, जिसमें बेहतर आवास, जलापूर्ति, स्वच्छता तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने संबंधी प्रावधान हैं। 

परमाणु शक्ति

‘हमें युद्ध के अलावा दूसरे शांतिपूर्ण कार्यों के लिए भी परमाणु ऊर्जा विकसित करना चाहिए। लेकिन अगर इसका इस्तेमाल दूसरे कार्य में करने की भी जरुरत पड़ती है तो हम में से किसी के अंदर का धर्मात्मा ऐसा करने से देश को नही रोकेगा।’ - पंडित जवाहरलाल नेहरु परमाणु बचाव स्थापित करना
देश ने हमेशा से इस संप्रभु अधिकार का बचाव किया है कि अगर कोई दूसरी शक्ति हमें परमाणु हमले की धमकी दे तब हम अवरोध या कहें कि बचाव के तौर पर इसका इस्तेमाल करेंगे।
आजादी के ठीक बाद भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग का गठन किया गया था और जाने-माने वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा इसके अध्यक्ष बनाए गए थे। वे 1948 से 1966 तक इसके अध्यक्ष रहे। इस दौरान हमने स्वदेशी परमाणु तकनीक विकसित करने में काफी प्रगति की और यह प्रक्रिया विक्रम साराभाई के कार्यकाल यानी 1966 से 1971 के दौरान और आगे बढ़ी।
श्रीमती इंदिरा गांधी ने पंडित नेहरु के सपने को 1967 से आगे बढ़ाया। पंडित जी का सपना भारत को इस परमाणु कार्यक्रम में आत्मनिर्भर बनाना था। हमने परमाणु बचाव करने के मकसद से पहला परमाणु परीक्षण 18 मई, 1974 को किया। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में हुए इस सफल परीक्षण ऑपरेशन का नाम ‘स्माइलिंग बुद्धा’ रखा गया था।

परमाणु कार्यक्रमों की शुरुआत इसलिए भी अनिवार्य हो गई थी कि चीन ने परमाणु परीक्षण किया था जो उकसावे की तरह लग रहा था।
लेकिन इंदिरा जी के लिए यह कार्यक्रम सिर्फ बचाव में उठाया गया कदम नहीं था। यह भारत की राष्ट्रीय शक्ति का प्रतीक था और भारत में सुरक्षात्मक दृष्टि से स्थायित्व स्थापित करने की ओर बढ़ाया गया कदम था।
यह कार्यक्रम 1974 में पूरा हो गया जब डॉ. राजा रमन्ना ने श्रीमती इंदिरा गांधी को कहा कि भारत के पास पहले परमाणु हथियार के परीक्षण की क्षमता आ गई है। इंदिरा जी ने परीक्षण के लिए मौखिक सहमति दे दी। इसके बाद भारतीय सेना के पोखरण परीक्षण रेंज में तैयारियां पूरी की गईं।
18 मई, 1974 को भारत ने राजस्थान के पोखरण में भूमिगत परमाणु परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया। अनाधिकारिक तौर पर इस ऑपरेशन को स्माइलिंग बुद्धा का नाम दिया गया था।
इंदिरा जी ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को पत्र लिखकर आश्वस्त किया कि भारत के ये परीक्षण शांतिपूर्ण कार्यों के लिए है और यह भारत की उस योजना का हिस्सा है जिसके तहत हम परमाणु कार्यक्रमों का इस्तेमाल औद्योगिक और वैज्ञानिक क्षेत्र में करना चाहते हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के अलावा भारत ऐसा पहला देश बना जिसने परमाणु परीक्षण किया। इसने उन ताकतों के खिलाफ ऐसा परमाणु बचाव खड़ा किया जो भारत पर परमाणु हमला करने का मंसूबा पाले हुए थे।

परमाणु निरस्त्रीकरण
भारतीय परमाणु निरस्त्रीकरण को लेकर प्रतिबद्ध रहा है और यह श्री राजीव गांधी द्वारा उठाए गए कदमों से साबित भी होता है। 9 जून, 1988 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दुनिया को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने की समयबद्ध कार्ययोजना पेश की।
इस कार्ययोजना को अगले 22 साल में तीन चरणों में लागू किया जाना था। उस वक्त इसे क्रांतिकारी माना गया क्योंकि दुनिया दो प्रतिस्पर्धी शक्ति समूहों में बंटी हुई थी।

उस योजना की मुख्य बातें थीं -
  • सबसे पहले तो सभी देशों को यह वचन देना होगा कि वे कम से कम 2010 से परमाणु हथियारों को खत्म करने की प्रक्रिया शुरु कर देंगे।
  • दूसरी बात यह कि सभी परमाणु शक्ति संपन्न देशों को परमाणु निरस्त्रीकरण प्रक्रिया में अनिवार्य तौर पर शामिल होना चाहिए। अन्य दूसरे देशों को भी इस प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए।
  • तीसरी बात यह कि आपसी भरोसे और आत्मविश्वास को बनाए रखने के लिए हर स्तर पर समान लक्ष्य को ध्यान में रखकर ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
  • चौथी बात यह कि दुनिया को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने के लिए राजनीतिक विमर्श, नीतियों और संस्थाओं में बदलाव लाना पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र के तहत व्यापक वैश्विक सुरक्षा तंत्र स्थापित करने के लिए बातचीत होनी चाहिए।
राजीव गांधी ने छह देशों द्वारा निरस्त्रीकरण की दिशा में की गई पहल में मुख्य भूमिका निभाई। संयुक्त राष्ट्र आम सभा के अपने भाषण में उन्होंने कहा कि ‘‘छह देशों की पहल करोड़ों लोगों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को स्वर दे रही है। एक ऐसे समय में जब दो परमाणु संपन्न देशों के संबंध सबसे बुरे दौर में, छह देशों - अर्जेंटिना, यूनान, भारत, मै

सूचना का अधिकार

सूचना का अधिकार

कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने चुने जाने के एक वर्ष के अंदर ही अधिक से अधिक पारदर्शिता लाने के लिए 2005 में ‘सूचना का अधिकार’ (आरटीआई) अधिनियम लागू किया। सूचना का अधिकार कानून लोगों को न केवल सवाल पूछने के लिए सशक्त बनाता है बल्कि जो लोग प्रशासन में अधिक पारदर्शिता चाहते थे, उनके लिए भी यह प्रभावी उपकरण साबित हुआ है। आरटीआई के जरिए विभिन्न विभागों से जानकारियां मांगी जा रही हैं और सरकार कानूनी तौर पर जवाब देने के लिए बाध्य हुई है।

यह भारत के लिए पारदर्शिता क्रांति से कम नहीं है। आरटीआई शासन की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का कारक बनी है। भारत के आरटीआई अधिनियम को दुनिया में एक आदर्श के रूप में देखा जा रहा है और कई देश इसका अनुकरण करना चाहते हैं।
कांग्रेस की पारदर्शिता और जवाबदेही उच्च स्तर तक ले जाने की प्रतिबद्धता ही है जो यूपीए सरकार ने नागरिक उत्पाद सेवा की समयबद्ध उपलब्धता और शिकायत निवारण अधिकार विधेयक, 2011 पेश किया है।
महात्मा गांधी नरेगा

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) विश्व की सबसे बड़ी रोजगार योजनाओं में से एक है। इसने लाखों भारतीयों में एक विश्वास जगाया है कि बेहतर भविष्य उनका इंतजार कर रहा है।
इस संसदीय अधिनियम के माध्यम से ग्रामीण भारतीय को रोजगार प्राप्त करने का कानूनी अधिकार मिला है - किसी भी राष्ट्र के लिए गरीबी और बेरोजगारी की समस्या के समाधान में यह बड़े बदलाव लाने वाला रास्ता है। आज मनरेगा का अध्ययन आईएलओ, संयुक्त राष्ट्र और अन्य कई देश कर रहे हैं। वे इस अनुकरणीय आदर्श को समझना चाहते हैं और अपने देशों में लागू करने की इच्छा रखते हैं।

पिछले सात वर्षों में सरकार ने 2 लाख करोड़ रुपए मनरेगा पर खर्च किए हैं। ताकि लाखों लोगों को सुनिश्चित रोजगार प्राप्त हो सके और उन्हें गरीबी से बचने के संसाधन मिल सके।
2012-13 में 136.18 करोड़ कार्य दिवस रोजगार के तौर पर 4.08 करोड़ परिवारों को दिया गया और इनमें 22 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 16 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और 53 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं।
100 कार्य दिवस की गारंटी न्यूनतम मजदूरी पर समाज के सबसे निचले और हाशिए पर खड़े तबके को दी गई है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य इन लोगों को आर्थिक रुप से सुरक्षित और सशक्त बनाना है। साथ ही उन्हें अवसाद और प्रवास के संकट से बाहर निकालकर ग्रामीण क्षेत्रों में टिकाऊ सामुदायिक संपदा का निर्माण करना भी है।

वन अधिकार अधिनियम
अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 को पारित करके यूपीए सरकार ने पंडित जवाहरलाल नेहरु की ‘पंचशील आदिवासी’ नीति को आगे बढ़ाया है। पंचशील नीति में उन्होंने आदिवासियों के विकास के लिए एक मॉडल सुझाया था। जिसमें आदिवासियों को अपना जीवन अपने तरीके से जीने देने की वकालत की गई थी। साथ ही आदिवासियों को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ने के लिए अवसर दिए जाते रहने की बात भी कही गई थी।

‘पंचशील आदिवासी’ में वर्णित मुख्य बिंदुओं में से एक आदिवासी अधिकार है जो उनके भूमि और वन में अधिकार को सम्मानपूर्वक स्वीकार करता है। वन अधिकार अधिनियम में न केवल उनकी जमीन पर अधिकार को मान्यता दी गई है बल्कि उन्हें अपने जीवन पर अधिक नियंत्रण भी दिया गया है।
31 जनवरी, 2012 तक कुल 31,68,478 दावे देश भर से प्राप्त किए जा चुके हैं। इनमें से 86 फीसदी दावों पर अमल भी हो चुका है। लगभग 12.51 लाख आदिवासी परिवारों को कुल 17.60 लाख हेक्टेयर जमीन संबंधित राज्य सरकारों द्वारा उनके दावों के सत्यापन के पश्चात सौंपी जा चुकी है।
शिक्षा का अधिकार कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने बच्चों की शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए 1 अप्रैल, 2010 से शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम लागू किया। यह कानून भारत में हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है।

इस अधिनियम के तहत सभी निजी विद्यालयों में समाज के पिछड़े और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटों को आरक्षित रखने का प्रावधान है। यह कानून गैर मान्यता प्राप्त सभी विद्यालयों को प्रतिबंधित करता है, साथ ही नामांकन के लिए डोनेशन या कैपिटेशन-फी और माता-पिता का साक्षात्कार लेने की प्रक्रिया को बंद करने आदेश देता है।

यह अधिनियम यह भी कहता है कि किसी भी बच्चे को एक ही कक्षा में रोका नहीं जा सकता। न ही उसे स्कूल से निष्कासित किया जा सकता है। साथ ही कोई भी बच्चा बगैर प्राथमिक शिक्षा पूरी किए बोर्ड परीक्षा पास नहीं कर सकता। इस कानून में ए

राष्ट्र का एकीकरण

वीपी मेनन द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘दि स्टोरी ऑफ दि इंटीग्रेशन ऑफ स्टेट्स’ के खास अंश 
‘जब अंग्रेजों की सरकार ने भारत को सत्ता हस्तांतरण करने का फैसला किया तो उन्होंने एक मुश्किल समस्या का सबसे अच्छा समाधान निकाला। उन्होंने तय किया कि भारतीय राज्यों में उनकी जो सर्वोपरिता है, वह उनके जाने के बाद स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। शासकों ने इसका स्वागत किया। क्योंकि इस मामले में अंग्रेज सरकार और शासक ही पक्षकार थे। इसके बाद वह हवेली रातों-रात ढह गई जिसे अंग्रेजों ने 150 साल में तैयार किया था। उस समय भी कई अंग्रेज और अमेरिकी शुभचिंतक थे, जो यह कह रहे थे कि इस समस्या की गंभीरता को भारत के बाहर ठीक से समझा नहीं गया। वे मान रहे थे कि यह भारत की सबसे बड़ी समस्या होने वाली है। भारत में भी बहुत कम लोग ही इस समस्या को समझ रहे थे कि इससे छोटे-छोट टुकड़ों में बिखर जाने का खतरा पैदा हो गया है।’

‘ब्रिटेन की संसद के लिए सर्वोपरिता के खत्म होने की घोषणा करना आसान था। लेकिन क्या ऐसी कोई घोषणा उन मूल बातों को बदल देगी जिस पर यह टिका हुआ था? इसका मतलब यह था कि अंग्रेजों के यहां से जाने के बाद भारत सरकार देश की सर्वोच्च संस्था नहीं होती। देश के रक्षा ढांचे ने ठीक से काम करना नहीं शुरु किया था। न ही उनके लिए यह बाध्यता थी कि वे बाहरी तकतों के आक्रमण से बचाव करें और देश में अमन-चैन कायम करने में मदद करें। ऐसा नहीं था तो फिर आखिर क्यों अंग्रेजों की सरकार ने बार-बार इस बात को दोहराया था कि भारतीय राज्यों से उनके संबंध के बारे में सर्वोपरिता का किसी समझौते से कोई संबंध नहीं है बल्कि यह तो राज्यों और उनके बीच का मामला है?’

‘वहीं दूसरी तरफ इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि अगर अंग्रेजों ने सर्वोपरिता सभी इकरारनामों के साथ आजाद भारत को हस्तांतरित की होती तो हमारे लिए भारतीय राज्यों का उस तरह से समाधान करना बेहद डरावना होता, जिस तरह से हमने किया। सर्वोपरिता खत्म होने से हमारे लिए बगैर किसी इकरारनामे में बंधे हुए खाली स्लेट पर अपने हिसाब से अपनी किस्मत लिखने का अवसर मिला।’

‘रजवाड़ों की पूरी श्रृंखला में सबसे कमजोर कड़ी थी छोटे राज्यों की बड़ी भारी-भरकम संख्या। इनके राजा स्वाभाविक तौर पर अपने भविष्य को लेकर शंकाग्रस्त थे। वहीं बड़े राज्यों के राजा सर्वोपरिता के खत्म हो जाने से खुश थे। क्योंकि उन्हें लगता था कि वे अपनी सीमाओं की रक्षा कर सकते हैं और उनके पास केंद्र से मोलभाव करके अपने हिसाब का समझौता करना आसान है। लेकिन वे यह समझने में नाकाम रहे कि भारत की नई सरकार राज्यों में निरंकुशता को बढ़ावा नहीं दे सकती और अगर उन्हें टिके रहना है तो या तो उन्हें जनता का समर्थन हासिल होना चाहिए या फिर भारत सरकार का संरक्षण। पहली बात ये राजा समझ नहीं पाए और दूसरी बात सर्वोपरिता के खत्म होने के साथ ही खत्म हो गई।’

‘हमारा पहला काम था देश के टुकड़े होने से बचाना और राज्यों को पाकिस्तानी प्रलोभन से बचाना। पाकिस्तान कुछ राज्यों को अपने साथ किसी भी शर्त पर मिलाने की कोशिश कर रहा था। ऐसा हमने परिग्रहण समझौतों या कहें कि एक्सेसन के जरिए किया। साथ ही हमने यथास्थिति बनाए रखने वाले समझौते भी किए। शुरुआत में शासकों को कई तरह के संदेह थे। लेकिन बाद में इनमें से ज्यादातर ने यह महसूस किया कि देश का बंटवारा हो जाने के बाद अगर वे भारत सरकार की मदद नहीं करेंगे तो बड़ी बाढ़ में देश के डूब जाने का खतरा है। बड़े राज्यों के राजा हमारे लिए और मुश्किलें पैदा कर सकते थे। कम से कम उतना तो जरुर जितना हैदराबाद और जूनागढ़ ने पैदा किया। उनकी सेना उस वक्त तक कायम थी और कई राज्यों में वे संगठन, हथियार और सामर्थ्य के मामले में टक्कर के थे। इसलिए वास्तविकता यह है कि इन राजाओं ने अपने हितों पर देश के हितों को तरजीह देकर राष्ट्रभक्ति का उदाहरण पेश किया। इनमें से कुछ तो ऐसे भी थे जिन्होंने अपने राज्य की आंतरिक सुरक्षा की परवाह किए बगैर मुश्किल घड़ी में अपनी सेना भी हमें दी।’

‘धीरे-धीरे वे समझ गए कि आजादी के बाद उनके सामने जनता को एक जवाबदेह सरकार देने के अलावा और कोई चारा नहीं है। इसका मतलत यह था कि उनका भविष्य उनके मंत्रियों की इच्छा पर निर्भर करता। उन्हें यह भी लगा कि अगर वे एकीकरण के लिए मान जाते हैं तो उनके हितों की रक्षा भारत सरकार करेगी। इसके अलावा उन्हें देश भर में ख्याति भी मिलेगी।’

‘कुछ लोकप्रिय मंत्रिमंडल के रवैये को लेकर भी आशंका थी। उदाहरण है कश्मीर। जब तक शेख अब्दुल्ला ने वहां का शासन अपने हाथ में नहीं ले लिया तब तक उनका जोर था कि वहां के महराजा राज्य से बाहर रहें। सरदार पटेल के आग्रह पर न चाहते हुए महाराजा इसके लिए तैयार ह

आंतरिक खतरों से लड़ाई

स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी के भाषण के ख़ास अंश
इस बात को हमेशा नहीं समझा जाता है कि राष्ट्रीय आदर्शों को बचाने में कितनी मेहनत होती है। हम ये मानकर नहीं चल सकते कि भारतीय संविधान भारत को एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के तौर पर परिभाषित करता है इसलिए हर कोई धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद या लोकतंत्र के रास्ते पर चल पड़ेगा।
हम सबको मालूम है कि हमारे धर्मनिरपेक्ष आदर्शों को सांप्रदायिक और धर्मांध लोगों से खतरा है। वे समुदायों के बीच संदेह के बीज डालकर हमारे समाज के लोकतांत्रिक आधार को कमज़ोर करना चाहते हैं।
लेकिन राष्ट्रीय विचारधारा से प्रेरित अधिकांश लोग उनके द्वारा भ्रमित होने को तैयार नहीं हैं। हमारा मूल दर्शन अपने अतीत और महात्मा गांधी व जवाहरलाल नेहरु जैसे नेताओं के नेतृत्व से उभरा है। इसमें कोई बदलाव संभव नहीं हो सकता, न ही इसमें कोई बदलाव होगा।
मैं आज और यहीं इस बात की घोषणा करना चाहता हूं कि हम इस रास्ते से हटेंगे नहीं। हमें कोई गलती नहीं करनी है। जिस तरह की चुनौतियों का देश सामना कर रहा है, वे आसान नहीं हैं। दुनिया में ऐसी ताकतें हैं जो भारत को नाकाम होते और अपने आंतरिक मतभेदों में उलझे देखना चाहती हैं। वैसी ताकतें भी हैं जो सक्रियता से आतंकवाद को बढ़ावा दे रही हैं। वैसी ताकतें भी हैं जो हमें अपने तय किए गए रास्ते से डिगाना चाहती हैं।
इन ताकतों का हमें सामना करना होगा। ऐसा करने का एकमात्र रास्ता यही है कि हमें अपने समूह के हितों से ऊपर राष्ट्रीय हितों को रखना होगा।
राष्ट्रभक्ति का मतलब यही है।
गणराज्य की रक्षा
जयप्रकाश आंदोलन
बिपिन चंद्र, मृदुला मुखर्जी और आदित्य मुखर्जी द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘इंडिया सिंस इंडिपेंडेंस’ के अंश
जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी पर हमेशा यह आरोप लगाया कि सत्ता की भूख में वे सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को तहस-नहस कर देना चाहती हैं और सोवियत रुस की तरह तानाशाही स्थापित करना चाहती हैं। जेपी का मानना था कि इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री पद पर रहना भारतीय लोकतंत्र को बचाए रखने के लिहाज से ठीक नहीं है।
जेपी आंदोलन कई तरह से त्रुटिपूर्ण था। इसकी संरचना, कार्ययोजना और इसके नेताओं के विचार त्रुटिपूर्ण थे। जयप्रकाश नारायण की पहचान एक ईमानदार, किसी पद की इच्छा न रखने वाले, निडर, निस्वार्थ और बलिदानी नेता के तौर पर थी। वे हमेशा नागरिक स्वतंत्रता और एक न्यायसंगत समाज स्थापित करने के लिए संघर्षरत रहे। लेकिन वैचारिक स्तर पर वे अस्पष्ट रहे। 1950 के दशक के शुरुआती दिनों में उन्होंने संसदीय राजनीति और संसदीय लोकतंत्र की आलोचना शुरु की। सालों तक उन्होंने दलविहीन लोकतंत्र के विचार को लोकप्रिय बनाने की कोशिश की। 1974-75 के दौरान उन्हें संपूर्ण क्रांति की वकालत की। उनके दोनों ही विचार अस्पष्ट थे। उन्होंने कभी भी ये नहीं समझाया कि दलविहीन राजनीति कैसी होगी और इसमें लोगों की इच्छाओं का कैसे समावेश होगा। इसी तरह से संपूर्ण क्रांति की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक नीतियों को भी ठीक से परिभाषित नहीं किया गया। जेपी एक लोकतांत्रिक नेता थे न कि तानाशाह और ना ही 1974-75 का उनका आंदोलन फासीवादी था; लेकिन, इससे फासीवादी लोगों के लिए जगह तैयार हो सकती थी।
जेपी की राजनीतिक अस्पष्टता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उन्होंने उन राजनीतिक दलों और समूहों का साथ लिया, जिनसे उनका कोई साम्य नहीं था और जो वैचारिक तौर पर अक्षम थीं। जयप्रकाश आंदोलन में सांप्रदायिक जनसंघ और जमात-ए-इस्लामी भी शामिल थे, तो फासीवादी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी हिस्सेदार था। वहीं, रुढ़ीवादी कांग्रेस संगठन के कुछ लोग भी उनके साथ थे तो कुछ समाजवादी और नक्सली समूह भी थे। अपनी प्रकृति में उनका आंदोलन नकारात्मक था और इसने इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल करने के अलावा और कोई भी वैकल्पिक विचार देश के सामने नहीं रखा।
जेपी आंदोलन ने विरोध के जिन तरीकों का इस्तेमाल किया, वे असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक थे। शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन की बजाए गुजरात और बिहार जैसे राज्यों में सरकारों को इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया गया। इसके लिए सरकारी कार्यालयों, विधानसभाओं, राजभवनों आदि का घेराव किया गया और जनप्रतिनिधियों को विधायिका से इस्तीफा देने के लिए धमकाया तक गया। यही रणनीति 1975-76 के जून-जुलाई में केंद्र में दोहराई जानी थी।
इससे भी ज्यादा गंभीर बात यह थी कि जेपी सेना, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को विद्रोह के लिए उकसा रहे थे। उन्होंने अपने आंदोलन के दौरान कई बार इनसे आग

राज्यों का सशक्तिकरण

राज्यों का एक समान विकास (विशेष विकास की जरुरत)
कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने हमेशा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में विशेष विकास की जरुरत को प्राथमिकता दी है।
पूर्वोत्तर राज्यों में बुनियादी ढांचे के विकास से संबंधित परियोजनाएं-
-  पिछले कुछ वर्षों में पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए 1,089.22 करोड़ की अनुमानित राशि वाली 106 इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स (बुनियादी ढांचे के विकास से संबंधित परियोजनाएं) को मंजूरी दी गई है। इसके अतिरिक्त 798.99 करोड़ की अतिरिक्त राशि गैर-रद्द संसाधन के केंद्रीय पूल योजना (एनएलसीपीआर) के अंतर्गत जारी की गई है।
 - भारत के हर गांव में विद्युतीकरण सुनिश्चित करने की दिशा में आगे बढ़ रही यूपीए सरकार ने वर्ष 2011-12 में पूर्वोत्तर के 11,250 गैर-विद्युतीकृत गांवों में विद्युतीकरण का काम शुरु किया और पहले से ही विद्युतीकृत 16,336 गांवों में सघन विद्युतीकरण के कार्य को पूरा करवाया। इसके अलावा, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतिकरण योजना के अंतर्गत 10.54 लाख ग्रामीण बीपीएल परिवारों को मुफ्त में बिजली कनेक्शन दिए गए हैं।
 - असम में कार्बी आंगलोंग की यूनाइटेड पीपुल्स डेमोक्रेटिक सॉलिडेरिटी गुट के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किया गया, जिसके तहत कार्बी-आंगलोंग पर्वतीय जिले को ज्यादा अधिकार और साढ़े तीन अरब रुपए का विशेष वित्तीय पैकेज दिया गया। इससे वहां सिर उठा रही कई समस्याएं खत्म होंगी। इसी तरह, नगालैंड के नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल के सभी गुटों के साथ संघर्ष विराम के रुप में नगा शांति वार्ता जारी है।
एक बार फिर शांति और पर्यटन की राह पर कश्मीर
- पूर्वोत्तर राज्यों की तरह जम्मू-कश्मीर में भी हिंसक घटनाओं में प्रत्यक्ष तौर पर कमी आई है और यह राज्य विगत दो वर्षों से पर्यटन में अभूतपूर्व वृद्धि देखने के बाद इस वर्ष भी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां तीर्थयात्रियों की भी अच्छी-खासी संख्या तीर्थाटन के लिए पहुंच रही है।
 - हिंसा का एक दशक देखने के बाद घाटी में शांति पसर रही है और यूपीए सरकार कश्मीरी विस्थापितों की घर वापसी और उनके पुनर्वास को सुनिश्चित करने में जुटी हुई है। कश्मीरी विस्थापितों की घर वापसी और उनके पुनर्वास के लिए प्रधानमंत्री द्वारा घोषित 1,618 करोड़ के पैकेज के क्रियान्वयन की घोषणा की जा चुकी है।
 - 495 ट्रांजिट आवास बनाने के लक्ष्य के तहत 335 ट्रांजिट आवाज बना लिए गए हैं।
- कश्मीरी विस्थापित युवाओं के लिए 3,000 से भी ज्यादा पदों का सृजन किया गया है, जिसमें से 2,169 उम्मीदवारों को नियुक्ति-पत्र जारी किए जा चुके हैं, जबकि 1,441 ने इन पदों पर अपनी सेवाएं देनी शुरु कर दी है।
 - कश्मीरी विस्थापितों के लिए 385 करोड़ की लागत से जम्मू में दो कमरे वाले 5,242 फ्लैट बनाने का काम प्रगति पर है। इन सभी आवासों का निर्माण-कार्य 2013 के मध्य तक पूरा होने की उम्मीद है।
- जम्मू क्षेत्र के स्पेशल टास्क फोर्स के लिए करीब 500 करोड़ रुपये की लागत की कई अल्पावधि की परियोजनाओं की सिफारिश की गई है। इसी तरह, लद्दाख क्षेत्र के स्पेशल टास्क फोर्स के लिए 415 करोड़ रुपये की ऐसी ही परियोजनाओं की सिफारिश की गई है। 2011-12 के केंद्रीय बजट में जम्मू के ढांचागत विकास के लिए 150 करोड़ रुपये की और लद्दाख के ढांचागत विकास के लिए 100 करोड़ रुपये की लागत वाली विशेष सहायता योजना बनाई गई है।
 - श्रीनगर के डल झील और नागिन झील के आसपास करीब 10,000 परिवारों के पुनर्वास और पुर्नस्थापन के लिए सरकार ने 356 करोड़ की लागत वाली योजना मंजूर की है।
- चिनाब बेसिन में पकल डल (1,000 मेगावाट), क्वार (520 मेगावाट) और कीरु (600 मेगावाट) परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय जलविद्युत निगम, जम्मू-कश्मीर राज्य विद्युत विकास निगम, पावर ट्रेडिंग कॉरपोरेशन और एक संयुक्त उद्यम कंपनी के बीच समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किया गया है। जम्मू-कश्मीर के 105 गैर-विद्युतीकरण और 1,777 आंशिक विद्युतीकरण वाले गांवों को पूर्ण रुप से विद्युतीकृत किया गया है और 31 मार्च, 2012 तक 30,353 बीपीएल परिवारों को मुफ्त बिजली कनेक्शन मुहैया कराया गया है।
- काफी अरसे के बाद जम्मू-कश्मीर में जमीनी स्तर पर भी लोकतंत्र लौटता दिखा है। राज्य में शांतिपूर्ण तरीके से पंचायत चुनाव हुए हैं, जिसमें 80 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया।
हिमायत और उड़ान
जम्मू-कश्मीर के युवाओं के लिए हिमायत और उ

आंतरिक सुरक्षा में सुधार

उत्तरांचल में 23-24 सितंबर, 2006 को आयोजित कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी द्वारा दिए गए भाषण के खास अंश

आतंकवाद
देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे आतंकवादी हमले निश्चित तौर पर गंभीर चिंता का विषय है। यह स्पष्ट है कि हमारे पूरे खुफिया तंत्र को बेहतर बनाने की जरुरत है। इस कार्य को परिश्रम और तत्परता से करने की जरुरत है। 
केंद्र सरकार सभी राज्यों को पूरी तरह से प्रशिक्षित और सभी जरुरी आधुनिक हथियारों से सुसज्जित आतंकवाद रोधी बल तैयार करने में सक्षम बनाने के लिए मदद करना चाहिए।
असामाजिक और राष्ट्र विरोधी तत्वों की पहचान करनी होगी और इन्हें अलग-थलग करके इनसे मजबूती से निपटना होगा। सामुदायिक समरसता से छेड़छाड़ करने वाले किसी भी संगठन के खिलाफ प्रभावी पुलिस कार्रवाई की जानी चाहिए। यह काम बगैर किसी सामाजिक पूर्वाग्रह और राजनीतिक दबाव के किया जाना चाहिए।

लेकिन अगर इसे टिकाऊ होना है तो ऐसी पुलिसिया कार्रवाई में स्थानीय लोगों को जागरुक और एकजुट करने पर जोर होना चाहिए। आतंकवाद विरोधी कोई भी कार्रवाई हमारे समाज में ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने वाली नहीं होनी चाहिए। हमारी पार्टी को इसे लेकर सजग रहना होगा। इस बात को जानते हुए भी कि आंतरिक सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं किया जा सकता, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई समुदाय यह महसूस न करे कि उसे संदेह के आधार पर बेवजह निशाना बनाया जा रहा है।

नक्सलवाद
नक्सलवाद न सिर्फ सामाजिक-आर्थिक समस्या है बल्कि यह कानून-व्यवस्था की भी समस्या है। आदिवासी इलाकों में प्रशासन को ज्यादा जवाबदेह और प्रभावी बनाने की जरुरत है। आदिवासी परिवारों के हितों की रक्षा करने वाले कानूनों का अक्षरशः पालन होना चाहिए।
यह सच्चाई है कि नक्सलवाद की चुनौती का सामना कई राज्य कर रहे हैं। इसलिए यह विचार किया गया कि इससे निपटने में केंद्र को अहम भूमिका निभानी चाहिए और राज्यों की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। केंद्र की भूमिका क्या होगी, इस बारे में काफी विचार-विमर्श करने की जरुरत है।

पूर्वोत्तर
पूर्वोत्तर के कुछ इलाकों की स्थिति हमें परेशान करने वाली है। इन इलाकों की भारी आर्थिक संभावनाओं का इस्तेमाल नहीं हो पाया है। क्योंकि यह इलाका अलगाववाद और सामुदायिक हिंसा की लपटों को झेलता रहा है।
मैं इस बात से पूरी तरह से आश्वस्त हूं कि अगर हमने विकास योजनाओं का लाभ वहां के लोगों तक पहुंचा दिया तो वहां अलगाववादी संगठनों की पकड़ ढीली पड़ जाएगी। हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि स्वायत्त जिला परिषद प्रभावी ढंग से काम करें और वहां के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करें।

जम्मू-कश्मीर
प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री हमें जम्मू कश्मीर की मौजूदा स्थिति के बारे में बताएंगे। वहां की गठबंधन सरकार विकास कार्यों को गति देने की कोशिश कर रही है। मुझे यकीन है कि दो साल पहले घोषित ‘प्रधानमंत्री पुनर्निर्माण पैकेज’ को वहां गंभीरता से लागू किया जा रहा है। इसके अलावा नियंत्रण रेखा के दोनों तरफ रहने वाले लोगों के बीच आपसी संबंधों को मजबूती देने के लिए भी कई कदम उठाए गए हैं।

एक राजनीतिक दल के तौर पर कांग्रेस ने हमेशा पाकिस्तान के साथ बातचीत की वकालत की है। जब हम विपक्ष में थे तब भी हमने उस वक्त की राजग सरकार का समर्थन जम्मू-कश्मीर सहित सभी मामलों पर पाकिस्तान से वार्ता के मसले पर किया था। कुछ ही दिन पहले घोषित शांति प्रक्रिया की कोशिशों को स्वागत करते हुए मैं प्रधानमंत्री की भावना को एक बार फिर अभिव्यक्त करना चाहूंगी। उन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों में पाकिस्तान स्थिति संगठनों द्वारा किए जाने वाले आतंकवादी हमले गंभीर चिंता का विषय है।

सीमा प्रबंधन
आंतरिक सुरक्षा को बनाए रखने के लिए यह जरुरी है कि हम प्रभावी सीमा प्रबंधन नीति अपनाएं। हमारे पूर्वोत्तर के मुख्यमंत्रियों ने अपनी चिंताएं ज़ाहिर की हैं। हमारी सीमाएं आतंकवादियों के मुक्त विचरण के रास्ते के तौर पर किसी भी हालत में इस्तेमाल नहीं की जाएंगी।

पुलिस सुधार
हर राज्य में आंतरिक सुरक्षा को बनाए रखने की सबसे अधिक जिम्मेदारी पुलिस की होती है। उन्हें स्वायत्त ढंग से काम करने की छूट मिलनी चाहिए। हां, एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में निगरानी और संतुलन जैसी व्यवस्था से पुलिस भी अछूती नहीं है।
पुलिसवालों और उनके परिवारों की बुनियादी जरुरतें पूरी होनी

पंचशील और गुटनिरपेक्ष

पंडित जवाहरलाल नेहरु द्वारा बेलग्रेड में गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों के सम्मेलन में 2 सितंबर, 1961 को दिया गया भाषण
इस सम्मेलन के प्रायोजकों द्वारा यह बैठक बुलाना एक समझदारी भरा फैसला था। हमारी बैठक कभी भी महत्वपूर्ण होती लेकिन पिछले दो-तीन महीने में जिस तरह की घटनाएं हुई हैं उसके बाद इसका महत्व और बढ़ गया है। यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हम एक ऐसे समय में मिले हैं जब मानव इतिहास एक संकट के दौर में है।

आज हर चीज को इस संकट ने ढक लिया है। चाहे वो साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और रंगभेद के खिलाफ चल रहे अभियान हों या फिर कोई और जरुरी काम। इसलिए हमारे लिए यह आवश्यक हो गया है कि हम इस संकट पर ध्यान दें जिससे मानवता का सामना हो रहा है। दुनिया की बड़ी शक्तियां भी हमारी ओर देख रही हैं।

हम खुद को गुटनिरपेक्ष देश कहते हैं। गुटनिरपेक्ष शब्द की अलग-अलग व्याख्या की जा सकती है। लेकिन यह शब्द इस संदर्भ में ईज़ाद किया गया था कि हम दुनिया के किसी भी शक्ति केंद्र के साथ नहीं रहेंगे। गुटनिरपेक्षता का नकारात्मक मतलब है। लेकिन अगर हम इसे सकारात्मक मतलब देंगे तो इसका अर्थ यह होगा कि हम वैसे राष्ट्र हैं जो युद्ध, सैन्य शक्ति केंद्र और सैन्य गठजोड़ का विरोध करते हैं। हम इन चीजों से दूर रहना चाहते हैं और शांति के पक्ष में खड़े होना चाहते हैं। अगर कहीं कोई युद्ध की संभावना बनती है तो हमारी कोशिश यह होगी कि युद्ध रोकने के लिए हमसे जो बन पड़े वह हम करें।
अगर इस संकट की घड़ी में युद्ध का भय खत्म करने में हम कोई मदद कर सकते हैं तो इसके लिए हम तैयार हैं। मैं जानता हूं कि इस समस्या के समाधान करने का अधिकार इस सम्मेलन को नहीं है। यह क्षमता तो दुनिया की दो बड़ी शक्तियां अमेरिका और सोवियत संघ के पास ही है। लेकिन इसके बावजूद यह सम्मेलन और यहां आए हुए देश इतने असहाय भी नहीं हैं कि वे युद्ध होते और पूरी दुनिया को अपनी आंखों के सामने बर्बाद होते देखें। यह ऐसा समय है जब हमें पूरी दुनिया को यह बताना होगा कि हम शांति चाहते हैं और जिस तरीके से भी संभव होगा हम इसके लिए संघर्ष करेंगे। यहां जमा हुए राष्ट्रों के पास न तो सैन्य ताकत है और न ही आर्थिक ताकत। मैं तो इसे ताकत भी नहीं मानता। यह नैतिक बल है। लेकिन अगर हम सब मिलकर अपने विवेक से युद्ध और शांति के मसले पर सोचें तो इससे काफी फर्क पड़ेगा।

लगभग छह, सात या आठ साल पहले गुटनिरपेक्षता एक दुर्लभ घटना थी। कुछ देश यहां-वहां इसके बारे में पूछते थे। दूसरे देश इसका मजाक उड़ाते थे और इसे गंभीरता से नहीं लेते थे। पूछते थे गुटनिरपेक्षता क्या है? वे कहते थे कि आपको या तो इस ओर रहना पड़ेगा या उस ओर। इस तर्क का अब कोई मतलब नहीं रहा। पिछले कुछ सालों का इतिहास बताता है कि गुटनिरपेक्षता को लेकर पूरी दुनिया में रुझान बढ़ा है। क्यों? क्योंकि जिस तरह की घटनाएं हो रही थीं उसमें यही होना था। यह बहुसंख्यक लोगों की सोच के अनुरुप है। चाहे कोई भी देश गुटनिरपेक्ष हो या नहीं लेकिन हर जगह के लोग यह मानते थे कि उन्होंने युद्ध और परमाणु हमलों के लिए भूखे रहकर संघर्ष नहीं किया है। इसलिए उनका ध्यान उन देशों की ओर गया जो इस रास्ते पर चलने को तैयार नहीं थे।

आज हम वैसी स्थिति में हैं जहां शांति या युद्ध के लिए बातचीत का कोई विकल्प नहीं बचा है। अगर लोग बातचीत से इनकार करते हैं तो युद्ध ही होगा। मैं आश्चर्यचकित हूं कि शक्तिशाली देशों द्वारा इतना हठी रवैया अपनाया जा रहा है। वे चाहे तो शांति कायम करने के लिए कितना कुछ कर सकते हैं। मैं यह कहना चाहता हूं कि इस तरह के रवैये में उनकी प्रतिष्ठा दांव पर नहीं लगी हुई है बल्कि मानव जाति का भविष्य दांव पर लगा हुआ है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उन्हें बातचीत के लिए कहें।

मैं पक्के तौर पर यह मानता हूं कि इस समस्या के तुरंत समाधान का एकमात्र तरीका है निरस्त्रीकरण। मैं निरस्त्रीकरण को विश्व शांति के लिए बेहद अनिवार्य जरुरत मानता हूं। मुझे लगता है कि निरस्त्रीकरण के बगैर भय और टकराव की मौजूदा समस्याएं जारी रहेंगी। अगर यह सम्मेलन चाहे तब भी हम तुरंत निरस्त्रीकरण के लक्ष्य को हासिल करने की उम्मीद नहीं कर सकते। अभी के लिए तो हम सिर्फ यहीं कर सकते हैं कि इन भय और खतरों से बाहर निकलने के लिए बातचीत पर की जरुरत पर बल दें। अगर यह हो जाता है तो अगला कदम बाद में उठाया जाएगा।

मैं यह कहना चाहूंगा कि यह हमारे वश में नहीं है कि हम यह तय करें कि जर्मनी और बर्लिन के बारे में क्या किया जाए। मौजूदा तनाव की वजह यही है। मेरे लिए यह जरुरी है कि जीवन के निश्चित तथ्यों को स्वीकार किया जाए। दो स्वतंत्र संस्थाएं हैं- संघीय गणराज्य जर्मनी की सरकार और जर्मन लो

बांग्लादेश की मुक्ति

1.    बांग्लादेश की मुक्ति
‘बांग्लादेश में स्वतंत्रता आंदोलन की सफलता भारत के खिलाफ युद्ध बन गई है। इसके लिए पाकिस्तानी सेना का दुस्साहस जिम्मेदार है। इसलिए मेरी जनता और मेरी सरकार पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वह अपनी सुरक्षा करे और सीमाओं की रक्षा करे। हमारे सामने इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है कि हम अपने देश को युद्ध के लिए तैयार रखें।’
श्रीमति इंदिरा गांधी द्वारा 5 दिसंबर, 1971 को अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को लिखे गए पत्र का अंश -


 2.    पूर्वी पाकिस्तान में आतंक का राज
क. 1970 में पाकिस्तान में हुए चुनाव में शेख मुजीबुर्रहमान की आवामी लीग को पूर्वी पाकिस्तान में 169 में से 167 सीटें मिलीं। इस तरह से उन्हें 313 सदस्यों वाली पाकिस्तानी संसद में स्पष्ट बहुमत मिला। जब जुल्फिकार अली भुट्टो ने शेख रहमान को प्रधानमंत्री पद देने से इनकार कर दिया तो पूर्वी पाकिस्तान में विरोध-प्रदर्शन होने लगे।

ख. 7 मार्च को शेख रहमान ने ढाका के रेस कोर्स पर ऐतिहासिक भाषण दिया। इसमें उन्होंने कहा- हमारा संघर्ष हमारी आज़ादी के लिए है। हमारा संघर्ष हमारी स्वतंत्रता के लिए है।

ग. पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों के प्रभुत्व वाली सेना को बांग्लाभाषी इलाके के विद्रोह को कुचलने का हुक्म दिया। आवामी लीग को मिटा दिया गया और इसके कई नेता भागकर भारत आ गए।

घ. 25-26 मार्च, 1971 की रात को शेख रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें पश्चिमी पाकिस्तान ले जाया गया। इसके बाद ऑपरेशन सर्चलाइट चलाया। इसमें पूर्वी पाकिस्तान के बौद्धिकों को चुन-चुन कर मारने की कोशिश की गई।

ड़. पाकिस्तानी सेना और सेना समर्थित उग्रवादी संगठनों के हमले से बचने के लिए पूर्वी पाकिस्तान के एक करोड़ से अधिक लोग भागकर भारत आ गए।

च. पूर्वी पाकिस्तान के मुख्य मार्शल लॉ प्रशासक जनरल टिक्का खान ने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि जमीन के हर टुकड़े पर कब्जा जमा लो, चाहे इसके लिए रास्ते में आने वाले हर नागरिक को क्यों मारना पड़े।

छ. पश्चिमी पाकिस्तान में भारत विरोधी माहौल तेजी से बढ़ा। 1971 के पूरे नवंबर में पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं के नेतृत्व में हजारों लोगों ने पश्चिमी पाकिस्तान में मार्च निकालकर भारत को कुचलने की मांग की।


 3.    भारत ने बांग्लादेशी शरणार्थियों को आश्रय दिया और मदद पहुंचाई
क. भारत सरकार ने शरणार्थियों को सुरक्षित आश्रय देने के लिए अपनी सीमाओं को खोल दिया। ऐसा तब भी किया गया जब भारी संख्या में लोगों के आने की वजह से पहले से ही बोझ तले दबी भारतीय अर्थव्यवस्था पर और बोझ बढ़ रहा था। भारत सरकार और संबंधित राज्य की सरकार ने शरणार्थियों का ध्यान रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

ख. पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, मेघालय और त्रिपुरा की सरकार ने भारतीय सीमा के आस-पास शरणार्थी कैंप स्थापित किए।

ग. भारत सरकार ने लगातार वैश्विक समुदाय से अपील की। लेकिन किसी का कोई जवाब नहीं आया। इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी 27 मार्च, 1971 को अपनी सरकार की तरफ से पूर्वी पाकिस्तान के लोगों की ओर चलाए जा रहे स्वतंत्रता संघर्ष को पूरा समर्थन देने की घोषणा कर दी।


4.     प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी का निर्णायक नेतृत्व
क. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अगुवाई वाले भारतीय नेतृत्व ने यह तय किया कि नरसंहार को रोकने के लिए शरणार्थियों को शरण देने से अच्छा विकल्प यह है कि पाकिस्तानी सेना के खिलाफ हथियारबंद कार्रवाई की जाए।

ख. अपना देश छोड़कर आए पूर्वी पाकिस्तान की सेना के अधिकारियों और भारतीय खुफिया विभाग के सदस्यों ने मिलकर शरणार्थी शिविरों से मुक्ति वाहिनी गुरिल्ला का चयन शुरु कर दिया। शेख रहमान ने कहा था- हमने पहले से ही सीख लिया है कि कैसे अपनी जिंदगी कुर्बान करनी है, अब हमें कोई नहीं रोक सकता।

ग.3 दिसंबर की शाम 5:40 बजे पाकिस्तानी वायु सेना ने उत्तरी भारत पर हमला कर दिया। इससे दोनों देशों के बीच युद्ध की आधिकारिक शुरुआत हो गई। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने राष्ट्र को संबोधित किया और इस हमले को भारत के खिलाफ युद्ध की शुरुआत बताया। पाकिस्तानी हमले का फौरी जवाब भारतीय वायु से

भारत में स्वास्थ्य देखभाल

‘‘देश की सेवा में ही नागरिकता निहित है’’ - जवाहरलाल नेहरू

हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने वैज्ञानिक संस्कृति से लबरेज भारत की कल्पना की थी और ये वही दृष्टिकोण था जिसने उन्हें अपने देश के बेहतरीन संस्थान बनाने के रास्ते पर आगे बढ़ाया। कांग्रेस पार्टी के समर्थन से पंडित नेहरू ने हमारे देश में आईआईटी और आईआईएम जैसे अभियांत्रिकी और प्रबंधन संस्थानों से लेकर उम्दा अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसे वैज्ञानिक शिक्षण और स्वास्थ्य देखभाल की बुनियाद रखी। प्रत्येक नयी नीति या योजना के साथ उनकी सोच वाले भारत को इसके बाद की प्रत्येक कांग्रेस सरकारों द्वारा ठोस तरीके से आगे बढ़ाया गया, जिसमें दो पहलू हमेशा सबसे आगे रहे हैं: पहला, समाज के सबसे कमजोर वर्गों को फायदा देना और दूसरा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी का सर्वोत्तम प्रदर्शन करना।

एम्स को चिकित्सा शिक्षा का पैटर्न विकसित करने तथा चिकित्सा विज्ञान और प्रौद्योगिकी में अत्याधुनिक अनुसंधान का प्रदर्शन करने के उद्देश्य से संसद के अधिनियम द्वारा राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के तौर पर स्थापित किया गया था। यह आज भी देश के बेहतरीन चिकित्सा संस्थानों में से एक है।

स्वास्थ्य संकेतक

1947 में स्वतंत्र भारत गौरवशाली लेकिन अस्वस्थ देश था। जन्म के समय हमारी औसत जीवन की उम्मीद 32 साल थी तथा नवजात मृत्यु दर 146/1000 थी, बाल मृत्यु दर 246/1000 थी और मातृ मृत्यु दर 2000 / 1,00,000 से अधिक थी। बाद के दशकों में कांग्रेस सरकारों ने हमारे देश में स्वास्थ्य देखभाल में व्यापक सुधार लाने के लिये कड़ी मेहनत से काम किया और उत्साहवर्धक नतीजे हासिल किये। 2014 तक, जीवन की संभावना 68 वर्ष हो चुकी थी, नवजात मृत्यु दर 37.0 / 1000, बाल मृत्यु दर 47.7 / 1000 और मातृ मृत्यु दर 174 / 1,00,000 तक सुधर चुकी थी।

इसके अलावा कांग्रेस सरकारों ने कई घातक बीमारियों को जड़ से मिटाने में भी सफलता पायी, जिनके कारण कई दशकों तक देश के लोगों को पीड़ा उठानी पड़ी थी। 1974 में, देश में पोलियो के 15,000 से अधिक मामले थे, यह आंकड़ा 1997 तक घटकर मात्र 534 रह गया और अंततः 2011 में सिर्फ 1 मामला ही सामने आया। कांग्रेस सरकारों ने हमारी जिंदगी से पोलियो की बीमारी को पूरी तरह से मिटा दिया है। कुष्ठरोग का मामला भी ऐसा ही था, 1983 में इसकी प्रसार दर 57.8 / 10,000 थी, लेकिन, यह संख्या 2014 तक तेजी से घटकर 0.68 / 10,000 रह गयी।

कांग्रेस सरकारों के नेतृत्व में मलेरिया, क्षय रोग, एचआईवी संक्रमण और चेचक जैसी बीमारियों की तादाद काफी हद तक कम हो गयी।

स्वास्थ्य देखभाल नीतियां

2004 में, यूपीए सरकार ने स्वास्थ्य खर्च को करीब चार गुना बढ़ाते हुए 7500 करोड़ रुपये से 27,000 करोड़ रुपये किया और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) की शुरुआत की। वंचित और कमजोर समूहों पर विशेष ध्यान देने के साथ ही ग्रामीण आबादी को एक समान, किफायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं प्रदान करने के लिए यह योजना तैयार की गयी। एनआरएचएम अधिकारित कार्य समूह (ईएजी) राज्यों, पूर्वोत्तर राज्यों, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में विशेष ध्यान दिया गया। इस योजना के जरिये यह सुनिश्चित किया गया कि स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न घटकों जैसे शिक्षा, जल, स्वच्छता, पोषण, सामाजिक और लिंग समानता पर साथ-साथ कार्रवाई की जाए।

सरकार ने राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) की शुरुआत भी की, इस अभिनव योजना के तहत बाल स्वास्थ्य जांच और प्रारंभिक बचाव सेवाओं की परिकल्पना की गई। इस कार्यक्रम के तहत प्रारंभिक पहचान और देखभाल, समर्थन और उपचार मुहैया कराने के लिए व्यवस्थित दृष्टिकोण तैयार किया गया।

मातृ और नवजात मृत्यु दर की समस्या से निपटने के लिए यूपीए सरकार ने वर्ष 2005 में एनआरएचएम के तहत जननी सुरक्षा योजना की शुरुआत की। यह योजना सुरक्षित मातृत्व के लिये गरीब गर्भवती महिलाओं द्वारा संस्थागत प्रसव अपनाने को बढ़ावा देती है। इस योजना के तहत 1करोड़ 20 लाख से अधिक प्रसव कराये गये, परिवारों पर कोई खर्च का बोझ नहीं पड़ा। नतीजतन मातृ मृत्यु दर में काफी गिरावट आयी।

देश भर में बीपीएल परिवारों के लिये स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाला खर्च मौजूदा प्रमुख मुद्दों में से एक था। इससे निपटने के लिए यूपीए सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) की शुरूआत की - जो बीपीएल परिवारों को स्वास्थ्य बीमा प्रदान करती है। आरएसबीवाई प्रभावित परिवारों को स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च से बचाता है जो उनकी जीवन भर की बचत को खत्म कर सकता है। इन परिवारों को स्वास्थ्य बीमा के तौर पर हर साल 30,000 रुपये दिये जाते हैं। इस कार्यक्रम में अब तक 3.5 करोड़ परिवारों को शामिल किया गया है। पूरी दुनिया के नेताओं ने इस योजना की सराहना अद्वितीय, अभिनव और समावेशी व्यावसायिक मॉडल के रूप में की है।

कांग्रेस सरकार द्वारा शुरु की गयी कई नीतियां हैं, जिन्होंने देश के समग्र स्वास्थ्य देखभाल पर सकारात्मक प्रभाव डाला है। बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान से लेकर मुफ्त दवा प्रदान करने तक, हमेशा इस बात का ध्यान रखा गया कि समाज के कमजोर वर्गों की हर संभव मदद हो सके। हालांकि, अभी भी काफी कुछ किया जाना है, हमारा मानना है कि समाज के सबसे कमजोर वर्गों की मदद के लिये विज्ञान और प्रौद्योगिकी की ताकत का उपयोग करने वाले पंडित नेहरू के बताये रास्ते पर टिके रहना जरुरी है। एक देश के तौर पर हमें वंचित वर्गों के उत्थान के लिये कड़ी मेहनत से कोशिश करनी होगी और अपने प्रत्येक नागरिक तक समान पहुंच, अवसर और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए समय, धन और प्रयास का निवेश करना होगा। यह तभी होगा जब हम में से हर कोई स्वस्थ, प्रसन्न और समृद्ध हो, ताकि संपूर्ण भारत विकसित राष्ट्र बन सके।

भारत में स्वास्थ्य देखभाल